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शिक्षा में सरकारी चिंतन महज सांख्यिकी आंकड़ों तक सिमटा

शिक्षा में जब शिक्षाविद् चिंतन नहीं करते और करते भी हैं तो उनके चिंतन की सरकार में कोई अहमियत नहीं, या फिर ऐसे शिक्षाविद हैं ही नहीं जो इस देश की 60-70 प्रतिशत गरीब आबादी की शिक्षा के लिए सही चिंतन करें। इसलिए सरकार ने स्वयं चिंतन शुरू किया और यह चिंतन केवल सांख्यिकी आंकड़ों का चिंतन बनकर रह गया।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कई गलतियों को स्वीकार कर लिया जाता है। इसलिए केंद्र में जब सर्वशिक्षा अभियान और स्कूलों के हालात को लेकर संसद में सवाल उठाए गए तो कहना पड़ा कि हम 85 प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य 2015 तक भी पूरा शायद नहीं कर पाएंगे।

यह भी कहा गया कि लगभग 46 हजार स्कूल ऐसे हैं जिनके पास भवन नहीं हैं, और 23 हजार स्कूल ऐसे हैं जहां ब्लेक बोर्ड से लेकर आवश्यक प्राथमिक सुविधाएं नहीं हैं और 22 हजार स्कूल ऐसे हैं जहां शिक्षक नहीं हैं। इसी तरह जब लड़कियों की शिक्षा पर पूछा गया तो बताया कि जितनी लड़कियां स्कूलों में प्रवेश लेती हैं उनमें से कक्षा एक के बाद ही 14 प्रतिशत लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं और मुश्किल से एक प्रतिशत लड़कियां साक्षरता के तमाम प्रयासों के बावजूद 68 प्रतिशत तक नहीं पहुंच पा रही हैं जबकि पुरुष साक्षरता 70 प्रतिशत से अधिक हो गई है।

मध्यप्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां शिक्षा में सब कुछ सरकारों के बदलने के साथ बदल दिया जाता है। कभी गांधी हटाकर हेडगेवार रख दिए जाते हैं तो कभी गांधी-नेहरू की कविता पर विवाद हो जाता है। कभी राजीव गांधी को निगरुट राजनीति का सबसे बड़ा विश्व नेता बता दिया जाता है तो कभी नेहरू शास्त्री और इंदिरा युग का इतिहास पढ़ाया जाता है।

यहां शिक्षक के नाम पर भी तरह-तरह के मजाक किए गए। कभी शिक्षक थे, कभी संविदा शिक्षक कभी निम्न श्रेणी शिक्षक, कभी उपशिक्षक, कभी शिक्षाकर्मी तो कभी गुरुजी। शिक्षक के पद कम हुए और कद भी कम हुए। एक समय तो ऐसा था जब शिक्षक का वेतन दफ्तरों के चतुर्थ वर्ग कर्मचारी से भी कम था और आज भी शिक्षाकर्मी, गुरुजी जिन्हें अब शिक्षक कहा जाने वाला है उनका वेतन चपरासियों से कम है। यदि गरीबी की रेखा के विश्व मानक अपनाए जाएं तो मध्य प्रदेश के शिक्षक गरीबी की रेखा से भी नीचे हैं।

मध्यप्रदेश का स्कूल शिक्षा विभाग हो या उच्च शिक्षा विभाग या विश्वविद्यालय सभी जगह एक प्रकार से अराजक और मनमाने नियम कानून हैं। मध्यप्रदेश में 45 बुनियादी शिक्षा संस्थाएं और 10 शिक्षा महाविद्यालय थे। केंद्र सरकार को लगा कि शिक्षा का स्तर तब तक ऊंचा नहीं उठ सकता जब तक शिक्षक प्रशिक्षण ऊंचे स्तर का नहीं होता। विचार सही था और इस बात को अमली जामा पहनाने के लिए केंद्र सरकार ने सांसद से पारित नीति के अनुसार राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद बना डाली जिसका केंद्रीय मुख्यालय दिल्ली और क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल, भुवनेश्वर, बेंगलूर और जयपुर में रखे गए।

मध्यप्रदेश में गत 20-25 बरस से प्रशिक्षण संस्थाओं को मिटा देने का प्रशासनिक खेल शुरू हुआ था। यहां एनसीईआरटी की तर्ज पर एससीआरटी बनाई गई जो अपने 1982-83 में जन्म के बाद से एक ही अपाहिज संस्था बनी रही और अब जब राज्य शिक्षा केंद्र बन गया है तों वह अस्तित्वहीन सी हो गई है। इसी तरह राज्य स्तर के चार प्रशिक्षण संस्थान, मनोविज्ञान, अंग्रेजी भाषा और समाज शास्त्र के लिए थे।

शिक्षा महाविद्यालय थे जहां प्राचार्य, प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, व्याख्याता के पद गजेटेड थे और क्राफ्ट टीचर थे, वहां काम हो रहा था। सरकारी शिक्षक नियमित निर्धारित संस्था में प्रशिक्षण लेते थे। यद्यपि प्रयोगों और नवाचारों की कमी थी, नयापन नहीं था, सोच विचार नहीं था और एक प्रकार से प्रशिक्षण रूढ़िगत ही था। इसलिए उन्हें सक्रिय करने के लिए अनेक छोटे-छोटे प्रशिक्षण किए गए। जिला स्तर और संभाग स्तर पर अधिकारियों का टोटा है।

स्कूल प्राचार्यो को पदोन्नति देना सरकार नहीं चाहती न कोई प्रशिक्षण संस्थान और प्रशासन का एक काडर बना कर उसे लागू करना चाहती। प्रौढ़ शिक्षा के अधिकारियों को ये पद दिए जा रहे हैं जिनको लेकर किताब खरीदी से लेकर जिला संभाग के प्रशिक्षण और प्रशासन तक में कई संदेह हैं। न इंजीनियरों की तरह अखिल भारतीय शिक्षा प्रशासनिक सेवा है न राज्य स्तर पर ऐसा है।

इसलिए कभी डिप्टी कलेक्टर तो कभी उच्च शिक्षा का तो कभी हायर सेकंडरी का आदमी प्रशासन के पद पर आता है और पुलिस या रेवेन्यू विभाग की तरह शिक्षा विभाग चलाता है। यदि सरकार की यह ईमानदार राय है कि शिक्षा का काडर प्रशिक्षण के लिए अलग हो और हर प्रशासन स्तर पर अलग हो तो विचार अच्छा है। मगर क्या निर्णय लागू होने तक बहुत देर नहीं हो जाएगी?
-लेखक शिक्षाविद् हैं।





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