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पोलस्टर बोले तो-कहीं तीर कहीं तुक्का

अभिमत. दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों-अमेरिका और भारत में और मामलों में समानता हो न हो मगर नमूना सर्वेक्षणों के जरिये चुनावी नतीजों का पूर्वानुमान लगाने वालों पोलस्टरों की भविष्यवाणियों में जरूर समानता है।

दोनों देशों के पोलस्टर जो भविष्यवाणियां करते हैं, वे अक्सर गलत साबित होती हैं और ऐसा होने पर दोनों देशों के पोलस्टर लगभग एक जैसे कारण गिनाते हैं। वैसे तो गलत चुनावी भविष्यवाणियों के ढेरों उदाहरण मौजूद हैं मगर भारत में गुजरात विधानसभा के चुनावों और अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने के लिए हुए प्राथमिक चुनावों में पोलस्टरों की जो गत बनी है वह काबिले गौर है।

गुजरात के बारे में ज्यादातर पोलस्टर यह भविष्यवाणी करते हुए नहीं अघा रहे थे कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का पुन: सत्ता हासिल करना मुश्किल है और भाजपा जीती भी तो उसके बहुमत में कमी आ जाएगी। सौराष्ट्र में तो भाजपा की हार तक की भविष्यवाणी की जा रही थी लेकिन हुआ उलटा। भाजपा ने न केवल शानदार जीत दर्ज की, बल्कि सौराष्ट्र में अपनी सीटें बढ़ा भी लीं।

अलबत्ता, पोलस्टर जिस मध्य गुजरात इलाके में भाजपा के पक्ष में मुकाबला एकतरफा बता रहे थे वहां पार्टी को जरूर कठिन मुकाबलों से गुजरना पड़ा। इसी तरह अमेरिका के पोलस्टर न्यू हैम्पशायर में मतदान के ऐन पहले तक अश्वेत सीनेटर बराक ओबामा की भारी बढ़त पर दांव लगा रहे थे और वहां जीत हुई हिलेरी क्लिंटन की जो इओवा में तीसरे क्रम पर पिछड़ गई थीं।

गुजरात और न्यू हैम्पशायर के ये नतीजे बताते हैं कि पोलस्टरों की भविष्यवाणियां प्राय: अंधेरे में छोड़े गए उस तीर की तरह होती हैं जो निशाने पर बैठा तो तीर अन्यथा तुक्का। जाहिर है कि कुछेक लोगों के व्यवहार-प्रतिक्रिया को आधार मानकर व्यापक मानव समूहों के व्यवहार-प्रतिक्रिया के बारे में कोई सटीक भविष्यवाणी करना अभी संभव नहीं हुआ है।





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