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वैश्वीकरण के दौर में हिंदी

दृष्टिकोण. दस जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन से हिंदी को विश्वव्यापी स्वरूप देने की शुरुआत की गई थी। इस सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक भाष बनाना था। इन 33 वर्षो में आठ विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं और हर बार इस प्रस्ताव को दोहराया भर गया है।

पिछली बार न्यूयार्क में आठवें हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन सत्र संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय में ही हुआ था। इसे संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भी संबोधित किया और वे अंशत: हिंदी में भी बोले थे। वैश्विक स्तर पर यह गौरवमयी क्षण अवश्य था किंतु यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि इससे हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने की जटिल प्रक्रिया से छुटकारा मिल जाएगा।

हिंदी को मान्यता दिलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की कार्यावधि नियमावली के नियम 51 में संशोधन करना आवश्यक है। यह तभी संभव है जब इसके कुल सदस्य देशों में से आधे से अधिक प्रस्ताव का समर्थन करें। इसके लिए विदेश मंत्रालय की ओर से एडवोकेसी पेपर सभी सदस्य राष्ट्रों को भिजवाना होता है। इस सारी प्रक्रिया को वर्ष 2008 तक पूरी करने हेतु अभी तक गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं। ऐसे में कोई भी अधिकारपूर्वक यह बता सकने की स्थिति में नहीं है कि अभी इसमें कितना समय और लग जाएगा।

वर्ष 2008 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने भाषाओं का अंतरराष्ट्रीय वर्ष घोषित किया है। यदि इस अभियान में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में प्रवेश दिलाना है तो विदेश मंत्रालय के साथ ही हमारे दूतावासों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। विश्व के विभिन्न देशों के दूतावास अपनी राष्ट्रभाषा में पारंगत होने के साथ ही संबंधित देश की भाषा का ज्ञान प्राप्त करने में भी नहीं हिचकते हैं।

किंतु यह विडंबना ही है कि हमारे देश के अधिकांश दूतावासों के कर्मचारी न तो अपनी राष्ट्रभाषा की परवाह करते हैं और न ही संबंधित देश की भाषा की। हमारे दूतावासों में अंग्रेजी का ही बोलबाला रहता है। देखना है कि विश्व हिंदी दिवस इस स्थिति को बदलने में कितना कारगर सिद्ध होता है? यह सर्वविदित है कि विदेशों में हिंदी को प्रतिस्थापित करने का श्रेय उन व्यक्तियों और संस्थाओं को जाता है, जिन्होंने हिंदी के पठन-पाठन को भारतीय संस्कृति के रूप में जीवित रखने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना।

भारत के अलावा विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई-लिखाई के माध्यम से भी जीवित है। किसी भी देश में हमारे दूतावास के सक्रिय होने पर अपनी भाषा और संस्कृति की तस्वीर कितनी उजली हो सकती है इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमें ब्रिटेन में देखने को मिलता है जब स्व. डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी वहां भारत के उच्चायुक्त थे। उन्होंने ब्रिटेन में आप्रवासी भारतीयों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने के इतने प्रयास किए कि आज पांच से अधिक संस्थाएं हिंदी की रचनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ा रही हैं। लंदन से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी पत्रिका 'पुरवाई' अपने 10 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। यदि हमारे अन्य दूतावास भी इसी तरह सक्रिय हो जाएं तो कम से कम प्रवासी भारतीयों में तो अपनी भाषा का अलख जगा ही सकते हैं।

हिंदी के विश्व व्यापी प्रचार-प्रसार के लिए मॅारीशस में भारत के सहयोग से विश्व हिंदी सचिवालय स्थापित करने का निर्णय भी नागपुर के प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में ही लिया गया था। किंतु अभी तक इस सचिवालय ने पूर्ण रूप से कार्य करना प्रारंभ नहीं किया है। 2001 में विश्व हिंदी सचिवालय के भवन का शिलान्यास मॉरीशस में तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने किया था किंतु सचिवालय के भवन का निर्माण अभी तक प्रारंभ नहीं हो पाया है।

भारत मॉरीशस का यह साझा प्रयास हिंदी को विश्व मंच पर प्रस्थापित करने में कारगर भूमिका निभा सकता है, बशर्ते यह भी वर्धा स्थित अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की तरह भीतरी खींचतान का शिकार न हो। विश्व के कई प्रमुख देशों में अब स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी है। अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा भाषा पहल कार्यक्रम से इसकी शुरुआत हो चुकी है।

ऑस्ट्रेलिया के स्कूलों में द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी भारतीय मूल के बच्चों में लोकप्रिय हो चुकी है। फिजी में भी हिंदी के पुराने दिन लौट आए हैं। फिजी सरकार ने हाल ही में अपनी नई भाषा नीति को मंजूरी देते हुए निर्णय लिया है कि अगले साल से देश के सभी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई लागू कर दी जाएगी। मॉरीशस में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है। यदि हमारे दूतावास सक्रिय हो जाएं तो विदेश मंत्रालय के सहयोग से अन्य देशों में भी यह कार्य हो सकता है। विशेषकर प्रमुख एशियाई देशों में इसकी अपार संभावनाएं हैं।

वैश्वीकरण और बाजारवाद ने हिंदी और भारतीय भाषाओं की ओर ध्यान देने के लिए मजबूर कर दिया है। बिल गेट्स के माइक्रोसॉफ्ट ने ऑफिस 2003 (हिंदी) पैकेज के माध्यम से यह साबित कर दिया है कि अंग्रेजी के ज्ञान के बगैर भी कम्प्यूटर पर अपना सारा कार्य हिंदी में किया जा सकता है। विश्व के कई प्रमुख देश अपनी भाषा नीति के प्रति इतने दृढ़ हैं कि वे प्रवासियों की भी कतई परवाह नहीं करते।

हाल ही में ब्रिटिश सरकार ने अपने आव्रजन नियमों को सख्त करते हुए कतिपय सरकारी दस्तावेजों एवं सरकारी साइन बोर्ड में भारतीय भाषाओं के प्रयोग को समाप्त करने का फैसला किया है। कई देशों की एयरलाइंस अपनी फ्लाइट में अपनी ही भाषा में आव्रजन फार्म व अन्य जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराती हैं। इधर भारत अंग्रेजी के मोहपाश में इस कदर जकड़ा हुआ है कि विभिन्न देशों से आने वाले पर्यटकों को यह आभास ही नहीं होता कि यहां कोई राष्ट्र भाषा भी है।

साइन बोर्ड से लेकर सारी व्यवस्था में अंग्रेजी का ही बोलबाला दिखाई देता है। क्या ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई से प्रेरणा लेकर हिंदी भाषी राज्य सरकारें भी यह कानून बनाएंगी कि प्रांत में व्यवसाय करने वाले संस्थान, व्यवसायी, डॉक्टर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, इंजीनियर आदि अपने साइन बोर्ड में अंग्रेजी के साथ हिंदी का प्रयोग अवश्य करेंगे? सारे देश की बात तो दूर यदि हिंदी भाषी प्रांतों में ही हिंदी का प्रयोग नहीं होगा तो हिंदी के वैश्विक स्वरूप को बढ़ाने की बात भी बेमानी होगी।

-लेखक विदेश में हिंदी मीडिया पर शोधरत हैं।





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