विशेषमध्यावधि चुनाव हों या न हों, यह वर्ष व्यावहारिक दृष्टि से केंद्र की यूपीए सरकार का अंतिम वर्ष होगा। अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में इस सरकार के कार्यो की तुलना पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार से अवश्य होगी। विकास योजनाओं से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक और सांप्रदायीकरण से लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव के समक्ष झुकने तक इस सरकार की घातक विभेदकारी नीतियां जाहिर हो चुकी हैं।
गरीबी व भुखमरी भारत के लिए हमेशा से समस्या रही है, परंतु इस सरकार के कार्यकाल में किसानों ने जितनी बड़ी संख्या में आत्महत्या की हैं, वह भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है। आतंकवादियों ने देश के राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक, धार्मिक और राष्ट्रवाद के प्रतीक सभी प्रमुख नगरों पर हमले किए। दूसरी तरफ सुखद पक्ष यह है कि भारतीय उद्योगपतियों ने आर्सेलर और कोरस जैसी दिग्गज यूरोपीय कंपनियों का अधिग्रहण कर अपनी उद्यमिता और व्यावसायिक दक्षता सिद्ध की। यह भी भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है।
यद्यपिइन दो अभूतपूर्व दृश्यों के मध्य का विरोधाभास अत्यधिक विद्रूप है। इसे समाप्त करना ही भावी भारत के लिए बड़ी चुनौती है। भू-मंडलीकरण के बाद आई पश्चिमीकरण की आंधी हमारे सभी सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन मूल्यों के लिए सबसे गंभीर चुनौती बन गई है। यदि हम आने वाले वर्षो में इस सांस्कृतिक चुनौती का सामना नहीं कर सके तो हमारी पूरी अस्मिता पर प्रश्नचिह्न् लगने की आशंका दिखती है।
व्यक्तिगत जीवन में मूल्यों का अभूतपूर्व हृास दिखाई पड़ रहा है। भारत और भारतीयता के शाश्वत मूल्यों पर आघात हो रहा है। गत वर्ष केंद्र सरकार ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकारने वाला हलफनामा देकर सनातन भारतीय मूल्यों के प्रतीक पर वज्रपात किया है। वोट बैंक की राजनीति की कीमत पर हिंदू समाज का तिरस्कार तो तथाकथित सेक्युलरवादी दल सदा करते रहे हैं परंतु हिंदुत्व का सीधा अपमान करने का ऐसा दुस्साहस तो अंग्रेज और औरंगजेब की हुकूमतों में भी नहीं हुआ था।
अटलजी ने पीएम के रूप में 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया था। उन्होंने देश को 50 वर्ष की जड़ता से निकाल कर प्रगति के नए पथ पर गतिशीलता के साथ स्थापित किया था। यह गतिशीलता आतंकवाद की गोलियों से लहूलुहान हो रहे आम आदमी, कर्ज के बोझ से दबकर आत्महत्या कर रहे किसान, महंगाई से पिस रही जनता के रहते कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। इनसे छुटकारा दिलाकर विकास को हर व्यक्ति, वर्ग, क्षेत्र तक पहुंचाने और 2020 तक विकसित राष्ट्र के सपने को साकार करने का कार्य भाजपा नेतृत्व की एनडीए सरकार ही कर सकती है।
हमने गुजरात और हिमाचल में शानदार सफलता पाई। गुजरात की जीत काविशेष महत्व है। अयोध्या आंदोलन के जरिये भाजपा ने पूरे भारत में जो ऊंचाई पाई थी, वह कई बार अन्य राज्यों में ऊपर नीचे होती रही, परंतु गुजरात में 1991 के लोकसभा चुनाव में हमने 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाए थे। तब से आज तक हमने लगभग सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपनी शक्ति यथावत बनाए रखी।
स्पष्ट है कि गुजरात इन 17 वर्षो में भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन गया है। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल वाम दलों का दुर्ग माना जाता है। दोनों सरकारों द्वारा किए कार्यो का अंतर देश की जनता के सामने है। मार्क्सवादी संवर्ग की अवधारणा पर बना बंगाल आज नंदीग्राम जैसी घटनाओं से क्षत-विक्षत है। दूसरी तरफ सांप्रदायिकता के घनघोर आरोपों के बीच से निकलता हुआ गुजरात विकास का प्रतीक बन गया है। नरेंद्र मोदी ने गुजराती अस्मिता और विकास को एक नया आयाम दिया है।