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आतंक के अंधेरे में

साहित्य, कला और आतंक: बहस

आतंकवाद की आकांक्षा हमेशा से ही रक्तरंजित और प्रवृत्ति पाशविक रही है। दहशत पैदा करने और फैलाने के लिए उसने नित नयी भंगिमाएं गढ़ीं। विध्वंस आतंकवाद की पहली शर्त रही। लेकिन कला और साहित्य ने आतंक की भाषा का विरोध सृजन से किया।

तालिबानियों के हाथों बामियान की बुद्घ प्रतिमाएं नष्ट हुई तो इसका मौन विरोध सैकड़ों चित्रकारों ने कैनवास पर तथागत के विचार और इमेज को रूपायित कर किया। पंजाबी कवि पाश तो खालिस्तानियों की गोलियों का शिकार भी बने। एक अलग तरह के आतंक का शिकार सफदर हाशमी हुए तो कलाकारों के समूह ने तेरह शहरों में कला-यात्राएं कर विरोध दर्ज किया।

भीड़ भरे इलाकों में हुई आतंकवादी घटनाओं के बाद अतुल देहिआ ने अपनी संवेदनाओं को कैनवास पर उकेरा। सृजन के यह प्रयास आतंक के गाढ़े अंधेरे में नजर आते उजाले के ओस कण हैं। फिर भी, यह देखना-समझना जरूरी है कि ताकत से पैर पसारते आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर साहित्य और दूसरे कला माध्यमों ने कितनी अधूरी या मुकम्मल बात की है।

आतंक-आतंक का खेल

उदय प्रकाश, कथाकार

किसी भी आतंक की पहली आहट वे पाते हैं, जो सबसे अधिक आरक्षित और बाध्य होते हैं। पारंपरिक लोक कहावतों की ओर देखिए, किसी भी अनहोनी, आपदा की संभावना में पहली हलचल निर्बल प्राणियों में ही होती है। विपदा की गंध से चींटिया बेचैन हो कर सुरक्षित शरण की खोज में भटकती हैं।

वॉन गॉग की पेंटिंग शायद आपने देखी हो, जिसमें आकाश में गहराते तूफान की आशंका में एक खेत में मक्के के पौधे डर कर सिहर गए हैं। संभवत: यह चित्र पिकासो के गुएर्निका से ज्यादा मार्मिक और दहशत भरा है। किसी भी तरह का आतंक उन लोगों के भीतर भय नहीं जगाता, जो ताकतवर हैं। संगठित-सुरक्षित हैं। ये तो आतंक-आतंक खेलते हैं।

बीसवीं सदी के मध्य लिखे गए बहुत से उन साहित्यकारों को पढ़िये, जो अकेले थे। आइजक बसाविश सिंगर के पात्र नाजियों से बचने के लिए संभावित मृत्यु से आसन्न मृत्यु की ओर यात्रा करते हैं। मुक्तिबोध की कविता ‘दिमागी गुहांधकार में ओरांग उटांगा’ सर्वग्रासी आतंक और हिंसा के बारे में हिन्दी की सबसे विरल कविता है।

यह कविता अपनों और दूसरों की हिंसा में भेद नहीं करती। इसलिए कलाएं हमेशा आतंक और जघन्यता को उनके उसी नाम से पुकारती हैं। सच्ची कलाएं मनुष्य ही नहीं चींटियों-तितलियों समेत हर उस जीवन के पक्ष में खड़ी होती हैं, जो बाध्य हैं। असशक्त हैं। सच्चे कलाकार का जीवन भी वैसा ही निर्बल रहा है। कलाकार कभी किसी गिरोह से जुड़ा आतंकवादी नहीं होता।

कोई जमीर है? गोपीचंद नारंगगोपीचंद नारंग, साहित्यकार

पिछले पंद्रह-बीस वर्र्षो में कुछ वÊाहों से दुनिया बहुत बदल गई है। ये वजह हैं - संचार क्रांति, इमीग्रेशन, ग्लोबलाइजेशन, ग्लोबल वार्मिंग और दहशतगर्दी। इनमें से पहली दो चीजों से नक्शे और समाज बदले। तीसरी की मार संस्कृति पर पड़ी और चौथी बात से पूरी पृथ्वी का मुस्तकबिल खतरे में है। लेकिन पांचवी और आखिरी बात से पूरी इंसानियत का मुस्तकबिल दांव पर लग गया है।

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद उम्मीद की जाती थी कि इतने रक्तपात के बाद अब कोई बड़ी जंग नहीं होगी। लेकिन ये सपना झूठा साबित हुआ है। आज आतंकवाद के पंजे इतने बढ़ जाएंगे कि उससे पूरी इंसानियत को खतरा होगा, ये बात भी सोच से परे थी। महात्मा गांधी की हत्या भी इसी देश में हुई और एक छोड़ दो-दो प्रधानमंत्री भी इसी देश में मारे गए। दाएं-बाएं के हालात भी अच्छे नहीं हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान सब जगह आतंकवाद ने अपने पंजे गाड़े हुए हैं। फिलिस्तीन और इजराइल से लेकर इराक और अफगानिस्तान बल्कि कहें श्रीलंका और बर्मा समेत सारा उप महाद्वीप आज आतंकवाद के नंगे खूनी नाच का शिकार है।

क्या वाकई इंसानियत खुद अपने हाथों अपना सर्वनाश करेगी? ये सवाल सबके सामने है। कलाकार, कवि, पत्रकार, साहित्यकार सब अपने-अपने तौर पर अपनी कला और अपनी रचनाओं के माध्यम से इंसान के जमीर को जगाने में लगे हैं। लेकिन क्या आतंकवाद का कोई जमीर है, जो किसी की बात सुनेगा?

शुतुरमुर्गी रवैया

शंकर शरण, लेखक

shankar-sharanकला का संबंध भावनाओं और विचारों के मौलिक संप्रेषण से है। इस दृष्टि से कला ने आतंकवाद पर मुंह छिपाने का काम ही किया है। दुनिया भर में लोग इस्लामी आतंकवाद के बारे में जो कुछ महसूस करते हैं, कला और लेखन में उसकी अभिव्यक्ति नगण्य रही है। बल्कि वास्तविक अनुभवों के विपरीत उल्टी बातें स्थापित करने की जिद देखी जाती है।

डेढ़ वर्ष पहले एक डेनिश अखबार में छपे एक काटरून पर हुई अंतरराष्ट्रीय हिंसा पर बौद्घिक बनाव-छिपाव इसका एक उदाहरण था। भारत में तो ऐसे उदाहरण निरंतर आते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि कला जगत ने आतंकवाद की सचाइयों के प्रति शुतुरमुर्गी रवैया बनाए रखा है। हमारे कलाकार और लेखक आतंकवाद के विरूद्घ अभिव्यक्ति पर लज्जास्पद रूप से भीरू रहे हैं।

आतंकवादियों के भयंकरतम कृत्यों पर भी तर्क करते हैें कि वे तो कुछ भ्रमित लोग हैं, जिनके कारनामों में उनकी वैचारिक, मजहबी प्रेरणाओं का कोई दोष नहीं। उल्टे जिहादियों की हिंसा को समझने का आग्रह किया जाता है कि वह किन्हीं अमेरिकी नीति की प्रतिक्रिया है आदि। किंतु उन्हीं महानुभावों को एक साधारण काटरून बनाने वाले के पक्ष में ऐसा कोई तर्क देते हम नहीं पाते।

तब सच क्या है? यही कि असुविधाजनक प्रश्नों से कतराना हमारे लेखकों-कलाकारों-बुद्घिजीवियों की विशेषता है। यदि आपके पास बात-बात में आग लगा देने वाले नेता और आत्मघाती दस्ते हैं तो ऊलजुलूल बातों का भी वे आदर करेंगे।

दहशत भरी स्मृतियांविजयबहादुर सिंहविजयबहादुर सिंह, आलोचक

आज लेखक होना एक चुनौती है। तरह-तरह की सरकारें उसे मारने पर तुली ही हुई हैं। आज तो लेखक भी बमुश्किल लेखक के साथ है।

शब्द आज जिंदगी से चलकर बहुत कम आते हैं। भूख और प्यास का जो चेहरा आज शब्दों में दिखता है उसकी तुलना ‘पूस की रात’ और ‘कफन’ जैसी प्रेमचंद की कहानियों से करें तो हकीकत सामने आ जाएगी। इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़ भी दे तो जमीनी अनुभवों का खरा टटकापन और कहन की नायाब भंगिमाएं दुर्लभ होती जा रही हैं।

कारण वही कि लेखकों में उस गहरे समर्पण का अभाव है, जिसे वे प्रतिबद्धता आदि नकली नारों से भरने की कोशिशें करते हैं। इनसे बेहतर कोशिशें तो उन दावाहीन फिल्मों में दिख जाती है जो निर्जीव से हो उठे सामूहिक जीवन में किंचित उथल-पुथल पैदा कर देती हैं। नए शास्त्र पूजकों, जिसमें सभी विचारधारावादी लेखक और आलोचक आते हैं, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचना-समृद्ध होने के बावजूद उस मन की खबर नहीं ले पाते जिसमं कई-कई प्रधानमंत्रियों की क्रूर और निर्मम हत्याओं की दहशतभरी स्मृतियां हैं।

भूख, गरीबी, सांप्रदायिकता, फासीवाद, सब सही हैं। लेकिन आतंकवाद क्या है? क्या बस एक खबर? राज्य से लेकर कुछेक व्यक्ति तक अगर इसमें शामिल हैं तो इसका अनुभव कौन करेगा? लेखक का यह समय-बोध उससे किसने छीना है? कहीं यह आतंक साहित्यिक हलकों में भी तो नहीं आ पहुंचा?

डर के बीच सृजन कैसेआतंक का रंग केवल भयानक काला होता है। लेकिन कला में काला रंग भी एक सुंदर रंग की तरह आ मिलता है। आतंकवाद में केवल आग्रह है, तेज आग्रह। बस केवल अपने पक्ष का, अपने सच का, अपने न्याय का। इसमें सत्य अंश हो सकता है पर केवल सत्य का नहीं झूठ का भी आग्रह मिल जाता है, लेकिन कला में आग्रह है सत्य का, वह भी बहुत धीरज के साथ। कला है कुछ बनाने का नाम, कुछ बनाने का काम। पर आतंक तो तोड़ने का नाम बन जाता है। यदि हम लगातार तोड़ते ही रहें तो कुछ बन नहीं पाता। आतंक में जितना अंश सत्य का, अन्याय से लड़ने का होगा- उसी अनुपात में उसका कला की तरफ, कुछ भनाने की तरफ झुकने का रास्ता खुल पाता है। जो उससे सहमत नहीं है, आतंकवाद उनको डराता है खुद से भी डरता है। डर के बीच सृजन की संभावना नहीं होता। वीभत्स और रौद्र भी रस माने गए हैं, पर घृणा और डर तो रसहीन है। हीनता में से कला जन्म नहीं ले पाती। आतंक भय की सृष्टि करने के लिए निदरेषों, निहत्थों, असहायों में भी विघ्न खोजता-फिरता है। इसके विपरीत कला विघ्नों को निर्विघ्न करने की कला में अपने रंग, स्वर, ताल, अभिव्यक्ति और अभिनय का उपयोग करती है। आतंकवाद को चाहे वह किसी भी विचार या धर्म का हो, कला से जोड़ा नहीं जा सकता। ‘आतंकवाद और कला’ के बीच लगा ‘और’ शब्द तो इन दोनों को अलग ही करता है।





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