अभी दिसंबर 2007 में ब्रिटेन में समीना मलिक के रूप में पहली बार ‘वैचारिक अपराध’ (थॉट क्राइम) के लिए नौ महीने के कारावास की निलंबित सजा सुनाई गई। समीना खुद को ‘लिरिकल टेररिस्ट’ (गीतात्मक आतंकवादी) कहती हैं।
उनकी एक कविता ‘कैसे सर उड़ाया जाए’में वे लिखती हैं-‘यह उतना अस्त-व्यस्त और कठोर भी नहीं जैसा कुछ लोग सोचते हैं। यह तो बस कलाई का प्रवाह है।’ उनकी कविताएं काफिरों के सिर एक के बाद एक काट लेने की कीमियागिरी बताती हैं और बहुत से लोगों को इस बात की त्रासद याद दिलाती है कि नक्सल हमदर्दियों ने भारत में भी ऐसे ही शत्रुओं को छह इंच छोटा कर देने की नृशंसता के हक में कविताएं लिखीं और वे किसी कानून की जद में नहीं आए। आज भी लाल आतंक हम सबकी आंखों के सामने घटता है और रचना के मुहाने पर किसी आंख का अश्रु-निर्झर जलप्रपात नहीं बनाता।
आतंक के तमाम रूप हो सकते हैं। गुआंटेनेमो के ब्लैक होल की यंत्रणा में सड़ाए गए कैदियों की कविताएं अभी सामने आई हैें और अमेरिकन ‘राज्य’ को यह स्वीकार करना पड़ा है कि उसके पाशविक और डार्क अत्याचारों से भी कैदी नहीं टूटे और ‘कविता के जरिए जिंदा रह गए।’ सर्वाइव्ड थ्रू पोएट्री। जुमान अल दोसारी नामक एक कैदी कवि लिखता है-मेरा खून लो/लो मेरा कफन और देह के अवशेष/लो एकांत कब्र पर मेरी लाश के फोटो/भेजो उन्हें संसार में/ न्यायाधीशों को/और उन्हें जिनके पास अंत:करण है।
सुसान ग्रीनहाल्घ ने समकालीन नाटकों तथा स्त्री और आतंकवाद के रिश्तों की पड़ताल करते हुए ‘बच्च गाड़ी में बम’ नामक एक साहित्यालोचकीय निबंध लिखा है। रिचर्ड बून भी हावर्ड ब्रेन्टन के नाटकों में आतंक का विश्लेषण कर रहे हैं। मास्को में वर्ष 2002 में प्रेस्नयाकोव बंधुओं ने ‘आतंकवाद’ नामक नाटक का मंचन किया। यह नाटक लंदन और स्पेन में भी जबरदस्त लोकप्रिय हुआ है।
यहां क्यों है कि फिल्में आतंकवाद का लगातार नोटिस ले रही हैं लेकिन साहित्य की मुख्यधारा में आतंकवाद अभी शामिल नहीं हुआ है। मुझे यह बात चकित करती है। शायद यह हमारे समय की सर्जनात्मकता के एक दिए गए फ्रेम में और चालू मुहावरों में गिरफ्तार हो जाने की गवाही भी देती है। ऐसा क्यों है कि हमारे यहां सांप्रदायिकता विरोधी लेखन की तो भरमार है और उसमें अपने वक्त की कुछ बहुत ही प्रामाणिक रचनाएं लिखी भी गई हैं, लेकिन आतंकवाद विरोधी सृजन बहुत ही कम हुआ है और बहुत अपवादस्वरूप उसमें उस तरह की मार्मिक रचनाएं देखने को मिली हैं।
आम मासूम आदमी को अकारण प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में आतंकवाद लील लेता है। फिर भी यह वैसी रचनात्मक प्रेरणा का सबब नहीं बन पाया, जिससे कालजयी कृतियां जन्म लेती हैं।
-मनोज श्रीवास्तव (अतिथि संपादक)