साहित्य, कला और आतंक: बहस
बम धमाके की तेज आवाज अब भी कानों पर बैठी लगती है। बर्बर और अमानवीय दृश्य का स्मृतियों में विचरना अभी भी जारी है। इंसानी भीड़ का मांस के लोथड़ों में तब्दील हो जाना असामान्य घटना ही है। काश! मेरी आंखें कमजोर होतीं और कान भी कुछ ऊंचा सुनते। अंधकार, धमाके और कराहती आवाजों का वह समय लगातार बेचैन करने वाला रहा। लगातार।
इस पल तक। पूरी जिंदगी आंखों के सामने से कैसे गुजर जाती है, यह अहसास भी उसी दिन हुआ। अठारह महीने से अधिक हो गए। लेकिन तारीख, दिन और समय खूब याद है।तारीख थी 2006 की 26 जुलाई और दिन बुधवार। उस दिन चर्च गेट से पांच चौवन की लोकल पकड़नी थी। दिन की पीली धूप कुछ सुर्ख लग रही थी।
मलाड में अपने घर पहुंचना मेरे लिए जरूरी था। चर्च गेट की एक दुकान से खरीदी गुड़िया शाम होते-होते अपनी बेटी हिना को देनी थी। ऐसा उससे वादा जो था। हिना को मैं हमेशा गुड़िया ही पुकारता हूं। गुड़िया जब छोटी थी तो हूबहू इस गुड़िया की तरह लगती थी। बोरिवेली तक जाने वाली लोकल में खूब भीड़ थी। दिन भर के कामकाज के बाद सभी घर लौटना चाहते थे। अंतत: घर लौटना कितनी तसल्ली देता है। घर वालों को भी और खुद को भी।
लोकल में खिड़की से लगी सीट पर बैठने की जगह कम ही मिल पाती है। आज न जाने कैसे मिल गई? ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी तो हवा का झोंका चेहरे को सुकून दे गया। हाथ में पकड़ी गुड़िया को मैंने इस अहसास के साथ खिड़की के पास बिठा दिया, जैसे वह खिलौना नहीं मेरी बेटी हो। मेरीन लाइन, चरनी रोड, ग्रांड रोड, मुम्बई सेंट्रल और दादर गुजर गया। लोग आते गए। उतरते गए। जिन्हें बांद्रा उतरना था वे दरवाजे के नजदीक खड़े हो गए। माहिम को उपेक्षित करती लोकल तेजी से दौड़ रही थी। अभी माहिम का प्लेटफार्म खत्म ही हुआ था कि कम्पारटमेंट की बिजली गुल हो गई। कुछ क्षण बाद जबरदस्त आवाज हुई। यह धमाका था।
बम ब्लास्ट। चारों तरफ धुंआ फैल गया। चीख, अंधकार और धुंआ। एक खौफनाक मंजर चारों तरफ बिखरा पड़ा था। कितने इंसान मांस के लोथड़े बन चुके थे। सृष्टि से उनके सारे सरोकार दहशत फैलाने वालों ने खत्म कर दिए। ब्लास्ट डिब्बे के एक कोने में हुआ था। उस तरफ डिब्बे के परखच्चे उड़ चुके थे। वहां खड़े-बैठे इंसानों की क्या बिसात? हाहाकार मच गया। मैंने गुड़िया को अपने सीने में समेट लिया। खिलौना होने के बावजूद वह डरी-सी लग रही थी।
मुम्बई में उस शाम थोड़े-थोड़े अंतराल में सात ट्रेनों में ब्लास्ट हुए। हर लोकल में भयावह दृश्य। दशहत फैलाने वालों के भीतर ये कैसा जीवनखोर जानवर बैठा हुआ है? सात ट्रेनों में हुए धमाकों ने बहुत सी जिंदगियों को निष्काषित कर दिया। गुड़िया मुझसे आतंक की इस भाषा का अंतिम निष्कर्ष पूछ रही थी।
(सतीश चण्डोक की आपबीती, जो मुंबई में रहते हैं)