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सूर्य की आराधना का पर्व संक्रांति

पर्व प्रसंग आकाश में सभी ग्रह बारह राशियों में भ्रमण करते हैं, उनका एक राशि से दूसरी राशि में गमन ही संक्रांति कहलाता है। हर ग्रह का राशियों में भ्रमण काल अलग-अलग होता है। सूर्य की संक्रांतियों को राशियों के हिसाब से चार भागों में बांटा गया है- विष्णुपद, षडशीति, विषुव व अयन संक्रांति। वृष, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ की संक्रांति विष्णुपद संज्ञक कही जाती है।

मिथुन, कन्या, धनु व मीन की संक्रांति षडशीति, मेष व तुला की विषुव तथा कर्क व मकर की संक्रांति अयन कहलाती है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में गमन का काल अति सूक्ष्म होता है। इसे ज्योतिषी गणित के माध्यम से ही जान सकते हैं। देवल के अनुसार संक्रांति का समय क्षणिक होने से दु™रेय है, इसलिए मुख्यकाल के ज्ञान के अभाव में गौण काल में भी दान आदि कार्य करना चाहिए। कालमाधव के अनुसार संक्रांति के पहले व बाद की ३क् घटी पवित्र कही गई हैं। धर्मशास्त्र में संक्रांतिकाल में दान, पुण्य व स्नान का विधान किया गया है। प्रत्येक संक्रांति को अलग-अलग पुण्यकाल कहा गया है।

त्रिंशत्ककर्टके नाड्य: मकरे तु दशाधिका:। भविष्यत्यागमे पुण्यं अतीतेचोत्तरायणो।

वेद में भी आया है-

यान् षड् दक्षिणोति मायांस्तान्, यान् षडुदगेति मासांस्तानिति।

यदि मकर की संक्रांति रात्रि में होती है तो दूसरे दिन ही पुण्यकाल होता है। सायंकाल सूर्योदय के बाद १ घंटा २४ मिनट में मकर संक्रांति हो तो पुण्यकाल पहले दिन होता है। इसी तरह यदि प्रात: सूर्योदय से १ घंटा २४ मिनट पूर्व कर्क संक्रांति हो तो पुण्यकाल बाद में होता है। दोनों संक्रांति रात में होने पर कर्क में पहले दिवा उत्तरार्ध व मकर में बाद वाले दिन के पूर्वार्ध को पुण्यकाल कहा गया है और उसमें भी पहले की घड़ियां अधिक पुण्यदायी मानी गई हैं।

मकर संक्रांति पर सफेद तिल से देवताओं के लिए और काले तिल से पितरों के लिए तर्पण करना चाहिए। इस दिन शिव का घी से अभिषेक महान फल देता है। ताम्रपात्र में सोने के साथ तिलदान का विशेष फल होता है। इस दिन भगवान शिव का गंध, पुष्प, फल, दीप, नैवेद्य से पूजन कर ब्राrाणों व संन्यासियों को भोजन कराएं व दक्षिणा दें।

स्वयं पंचगव्य का पान कर पारणा करें और वस्त्रदान करें। मान्यता है कि इस दिन तिल के बैल का दान करने से रोग मुक्ति व दूध से सूर्य भगवान को स्नान कराने से सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। अयन संक्रांति वाला दिन व उसके बाद का दूसरा दिन शुभ कार्यो में वर्जित है। यदि दिन में संक्रांति हो तो उससे पहले व बाद की रात्रि व उस दिन अध्ययन-अध्यापन बंद रहता है और यदि रात्रि में संक्रांति हो तो वह रात्रि तथा पूर्व व बाद के दिन अध्ययन-अध्यापन बंद रहता है। जिसके जन्म नक्षत्र में संक्रांति होती है उसे धनक्षय आदि पीड़ा होती है इसलिए उसे कमल पुष्प से युक्त जल से स्नान करना चाहिए। संक्रांति में स्नान का विधान है।

यदि रात्रि में संक्रांति हो तो दिन में ही स्नान करना की बात शास्त्र में कही गई है। कुछ लोग रात्रि में ही स्नान का विधान करते हैं। इस बार संक्रांति उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में हो रही है अत: इस नक्षत्र में पैदा हुए लोगों को विशेष स्नान, दान व पूजन करना चाहिए। यह संक्रांति ध्वांक्षी होने से व्यापारियों के लिए शुभ है और राक्षसप्रवृत्ति लोगों के लिए विशेष कष्टकारक।

लेखिका जयपुर में धर्मशास्त्र और भाषाविज्ञान की प्रोफेसर हैं।





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