मंडीमणिकर्ण के गर्म पानी के चश्मों से करोड़ों की बिजली पैदा की जा सकती है। गर्म पानी के इन चश्मों के रूप में मौजूद थर्मल एनर्जी इस एरिया की दशा-दिशा बदलने का दमखम रखती है। यह खुलासा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी मुंबई के भू-विज्ञानियों ने अपनी स्टडी में किया है। तुर्की में हुई वल्र्ड जियोथर्मल कांग्रेस में उनके इस शोध को सराहा गया है।
इंस्टीट्यूट के अर्थ साइंस डिपार्टमेंट के विज्ञानी डॉक्टर चंद्रशेखरम, एमए आलम और ए मिनिशल की रिसर्च में पता चला है कि कुल्लू की पावर्ती घाटी में 1760 मीटर की ऊंचाई पर बसे मणिकर्ण गांव के इन गर्म पानी के चश्मों में थर्मल डिस्चार्ज से बिजली पैदा की जा सकती है। इसके लिए जरूरी तकनीक आसानी से उपलब्ध है। हाइडल पावर की बजाय इस तकनीक से पैदा होने वाली बिजली कहीं सस्ती होगी।
मणिकर्ण के अलावा कसोल, जरी और खीरगंगा में गर्म पानी के चश्मे हैं। इनका पानी 96 डिग्री सेल्सियस डिग्री तक गर्म है। मणिकर्ण का पानी सबसे गर्म है। खीरगंगा के चश्मे को छोड़ अन्य चश्मों की नदी से दूरी दस मीटर से भी कम है। मणिकर्ण में जियो थर्मल ग्रीन हाउस से विंटर कल्टीवेशन का कॉन्सेप्ट विकसित किया जा सकता है।
मतलब भारी बर्फबारी के दौरान इस पानी को चैनलाइज कर इसे सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। थर्मल ग्रीन हाउस का प्रयोग यहां बेहद सफल रहा है। विज्ञानी कहते हैं कि मणिकर्ण के गर्म चश्मे इस क्षेत्र को फ्रूट प्रोसेसिंग हब के रूप में विकसित करने का दमखम रखते हैं।
जियोथर्मल एनर्जी बदल देगी इकोनॉमीइन चश्मों की जियो थर्मल पोटेंशियल को देखते हुए साइंटिस्ट सुझाव देते हैं कि यहां के थर्मल डिस्चार्ज को चैनलाइज कर आठ माह ठंड में ठिठुरने वाले मणिकर्ण के घरों, स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों, डिस्पेंसरियों और टूरिस्ट कॉम्पलेक्स में स्पेस हीटिंग सुविधा उपलब्ध करवाई जा सकती है। यहां कोल्ड स्टोर बनाने के लिए थर्मल फ्लो काम आ सकता है। ड्राइंग, प्रोसेसिंग और प्रिर्ज्िवग प्लांट्स लगाने में भी इन चश्मों का इस्तेमाल हो सकता है।
बिजली बोर्ड का थर्मल यूनिट केंद्र सरकार प्रायोजित योजना का सर्वे कर रहा है। इस सिलसिले में हिमऊर्जा भी उसकी मदद कर रहा है। ये प्रयास आरंभिक चरण में है।-आर.के. धीमान, निदेशक, हिमऊर्जा विभाग