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मकर संक्रांति पर विशेष

मकर संक्रांति पर विशेष यह दिन है तपस्या के फलित होने का। यह दिन बताता है कि भगीरथ सा तपस्वी हो तो स्वर्ग से गंगा धरती पर आ सकती हैं। यह दिन है पुत्र के घर पिता के लौट आने का। तब खत्म होती है नाराजगी और उमड़ता है प्रेम। यह नफरत के शीत के निपटने और प्रेम की गरमाहट पनपने का दिन है। यह दिन है परमात्मा में आत्मा के एकाकार होने का। यह मोक्ष की मान्यता का दिन है। यह देवताओं का दिन है।

मकर संक्रांति का त्योहार पूरे भारत में श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। पंजाब में यह माघी और लोहड़ी के नाम से तो दक्षिण में पोंगल के रूप में जाना जाता है। गंगा और अन्य पवित्र नदियों के तट पर लाखों लोग आज के दिन उदय होते सूर्य की प्रार्थना करते हैं। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं में सूर्य को भगवान का दर्जा दिया गया है। हिंदू मान्यता के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही मकर संक्रांति से देवताओं का दिन शुरु होता है। इसलिए इसे देवायन भी कहा जाता है, जबकि दक्षिणायन सूर्य देवताओं की रात्रि माने जाते हैं और उसे पितृयान कहा जाता है।

महाभारत की कथा के अनुसार बाण-शैया पर लेटे भीष्म ने अपनी इच्छा से इस दिन तक मृत्यु को रोके रखा था। एक अन्य कथा के अनुसार महाराज भगीरथ की महान तपस्या के बाद गंगा इसी दिन स्वर्ग से धरती पर उतरकर सागर से मिलीं और महाराज सगर के 60 हजार पुत्रों का तर्पण हो सका। इसलिए गंगा-सागर के मिलन स्थल पर हर साल आज के दिन मेला लगता है।

क्या सरक गई कर्क रेखा मध्यप्रदेश के विदिशा जिले की ऐतिहासिक पहाड़ी उदयगिरी की गुफाओं को सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासनकाल में 29 साल की मेहनत के बाद बनवाया गया था। उल्लेखनीय है कि उस दौरान कर्क रेखा यहीं से होकर गुजरती थी। पृथ्वी के अक्ष में झुकाव के कारण अब यह थोड़ा सरक गई है। यहां बनी भगवान वाराह की विशाल प्रतिमा को इस तरह से उकेरा गया है कि सूर्य के उत्तरायण की तिथि यानि मकर संक्रांति को पृथ्वी पर पड़ने वाली पहली किरण भगवान वाराह के चरण स्पर्श करते हुए ही निकलती थी।

पृथ्वी के समुद्र से उद्धार की इस कथा को उदयगिरी के पत्थरों पर बेहद खूबसूरत ढंग से उकेरा गया है। इतिहासकार अब इस बात पर खोज कर रहे हैं कि कभी यहां विशाल आकार का जलाशय रहा होगा, जो समुद्र का प्रतीक था। वाराह प्रतिमा के नीचे की ओर पानी के कटाव के निशान भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

इस बार 15 जनवरीइस बार सूर्य 14 जनवरी को रात 12 बजकर 7 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। पुण्य काल प्रात: 8 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। निर्णय सिंधु में भी मकर संक्रांति 15 जनवरी को दर्शाई गई है।

आचार्य शैलेंद्र शास्त्री, पानीपत

14 जनवरी ही महत्वपूर्णशास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि ही देवताओं का दिन मानी जाती है। देवताओं का ही प्रभातकाल है। इस दृष्टि से 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाई जानी चाहिए।

आचार्य लालमणि पांडेय, देवी मंदिर, पानीपत

कैसे मनाएं

सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि से निवृत हो, उगते सूरज को गायत्री मंत्र का जाप करते हुए दोनों हाथों से जल और पुष्प अर्पित करें।

मित्रों को तिल और गुड़ से बने लड्डू और मिठाइयां बांटें। भोजन में खिचड़ी खाएं। बेटे और बहू के घर जाकर उन्हें इस दिन कोई उपहार और आशीर्वाद दें।

एक हो जाते हैं कैलेंडर

पारंपरिक हिंदू कैलेंडर चंद्र पर आधारित हंै इसलिए सूर्य आधारित रोमन कैलेंडर के अनुरूप अधिकतर त्योहारों की तिथियां दोनों कैलेंडरों में वर्ष बदलने पर आपस में मेल नहीं करतीं हैं। दूसरी ओर मकर संक्रांति सूर्य के राशि बदलने पर आधारित है, इसलिए चंद्र और सूर्य आधारित दोनों ही कैलेंडरों में इसकी तिथि प्राय: 14 जनवरी समान ही रहती है। इस तरह मकर संक्रांति को दोनों कैलेंडर एक हो जाते हैं। इस बार पृथ्वी के झुकाव अंश में मामूली परिवर्तन के चलते यह त्योहार (कुछ जगह) 15 जनवरी को मनाया जा रहा है।

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sudhir pal
Monday, 14th Jan 2008, 13:50
mother and father hi bhagvan hai.unki puja keri sare tirath unhi ke cherno me hai.because wo hi yaha bhagvan hai