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अब लिंगभेद की शिकार महिलाएं

अभिमत. यह नया वर्ष महिलाओं के लिए सकारात्मक शुरुआत लेकर नहीं आया है। एक तरफ जहां उन्हें, खासकर विदेशी महिला पर्यटकों को देश के बड़े महानगरों में छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ा है, वहीं हालिया जारी एक रिपोर्ट ने भारतीय महिलाओं के साथ लैंगिक मतभेद बरकरार रहने की भी पुष्टि कर दी है।

यह रिपोर्ट बताती है कि पितृ-सत्तात्मक समाज में महिलाओं को बराबरी के अधिकार का दर्जा मौखिक ही ज्यादा है। वास्तविकता के धरातल पर उसे अमली जामा पहनाना पुरुषों के लिए कुनैन की गोली निगलने सा साबित हो रहा है।

एसोचैम की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय महिलाएं घर और दफ्तर दोनों ही जगह भेदभाव की शिकार हैं। घर की चहारदीवारी के भीतर जहां उन्हें अभी भी परिवार संभालने वाली छवि से आजाद नहीं किया गया है, वहीं किसी तरह चौखट लांघकर कार्यस्थल जा पहुंचीं महिलाओं को वहां भी भेदभाव का दंश झेलना पड़ रहा है।

काम के बढ़िया अवसर तो दूर रहे, उन्हें पदोन्नति के समान अवसर तक नहीं मिलते, जिससे वे शीर्ष पदों तक पहुंच नहीं पाती हैं। महज 3.3 फीसदी महिलाएं ही शीर्ष पदों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाती हैं।

सही है लिंगभेद की बुराई कोई नई नहीं, बल्कि आदिकाल से चली आ रही है और उसे दूर होने में भी समय लगेगा। खासकर, जब विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने में एकमत नहीं हो पा रहे हैं, तो आमजन की दुविधा और मनोदशा को सहज ही समझा जा सकता है।

महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का यह बर्ताव महज कानून बनाने से दूर होने वाला नहीं, इसके लिए जनजागरूकता के अलावा महिलाओं को स्वयं अपने स्तर पर भी प्रयास करने होंगे। उन्हें लड़कियों को लड़के के बराबर महत्व देना होगा और वैसी ही उसकी सोच विकसित करनी होगी। इसके बाद ही वास्तविकता के धरातल पर कुछ सकारात्मक बदलाव देखने में आएगा।





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