जीवन दर्शन. सन 1986 की घटना है, उस समय मैं शासकीय बालक माध्यमिक शाला घोरावाड़ीखुर्द, जिला छिंदवाड़ा में पदस्थ था। उस समय शासन द्वारा ग्रामीण प्रतिभावान परीक्षा आयोजित की जाती थी। जिसका परीक्षा केंद्र जिला स्तर या मुख्य तहसील स्तर पर गांव से 33 से 60 किलोमीटर दूर रहता था।
हमारे विद्यालय के छात्र-छात्राओं को इस परीक्षा में सम्मिलित होने हेतु एक दिन पूर्व निर्देशित कर बताया गया कि कल सुबह छह बजे सभी को बस स्टैंड पर उपस्थित रहना है। सभी छात्र-छात्राएं जो समीप के थे, वे तो समय पर आ गए किंतु एक छात्र जो कि 3 किलोमीटर दूरी पर रहता था, ठीक समय पर उपस्थित नहीं हो पाया।
संस्था प्रमुख ने कहा- अब बहुत समय हो चुका, सभी छात्र-छात्राएं बस में बैठ जाएं। सभी बच्चे बस में बैठ गए और बस चलने को हुई। मैंने संस्था प्रमुख से थोड़ी देर और रुकने का आग्रह किया और कहा कि उस छात्र को भी आने दें। तब उनका कहना था कि आप भी बस से उतर जाओ, उसे लेकर आना। मैं उनसे अनुरोध कर ही रहा था, इतने में देखा वह छात्र हांफता हुआ दौड़ा चला आ रहा है।
वह प्रतिभाशाली छात्र था और मेरा सोचना था कि भविष्य में वह आगे बढ़ेगा। मैंने उसे बस रोककर बैठाया। ग्रामीण प्रतिभावान परीक्षा में वह उत्तीर्ण हुआ। आज वह शिक्षक के पद पर नियुक्त है और उस दिन की घटना से उसका मेरे प्रति अगाध स्नेह है। कहते हैं अच्छे कर्म का अच्छा प्रतिफल मिलता है, शायद यही वजह है कि वर्ष 1994 में मुझे राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।