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आतंकवाद से हमें ही निपटना होगा

दृष्टिकोण. terrorism जब किसी मशहूर हस्ती की मौत होती है तब मीडिया में उसकी काफी चर्चा भी होती है। मगर बेनजीर की मौत के मामले में मुझे जिस बात पर सबसे ज्यादा हैरत हुई वह यह कि पाकिस्तान में कोई उस पर पछतावा करता नजर नहीं आया। वहां दुख और खेद तो काफी था मगर पछतावा नदारद था। पछतावे और खेद या दुख में बड़ा अंतर है।

जब कोई छोटा बच्च दुर्घटनावश किसी कार से भिड़ जाता है तब राह चलते लोगों को दुख हो सकता है मगर ड्राइवर अपनी गलती नहीं होने के बावजूद पछताता है। खेद जताने वाला व्यक्ति कहता है-यह बहुत बुरा हुआ। पछतावा करने वाला व्यक्ति सहम-सा जाता है और कभी-कभी तो वह ताजिंदगी सहमा-सहमा रहता है।

गांधी की मौत के समय नेहरू ने पछतावा किया था। युधिष्ठिर के पश्चाताप से हस्तिनापुर के टूटे-दुखी लोगों को सांत्वना मिली। मुझे लगता है कि बेनजीर की हत्या के बाद मुशर्रफ ने मेल-मिलाप का मौका गंवा दिया है।

भारतीय होने के नाते बेनजीर की मौत में हमारी रुचि मुख्यतया आतंकवाद की वजह से है। एक विचार यह भी है कि यदि बेनजीर जीवित रहतीं और उनकी अगुआई में पाकिस्तान में लोकतंत्र कायम होता, तो हम पर आतंकी हमलों में निश्चित रूप से कमी आती। कारण, तानाशाही व्यवस्था के मुकाबले लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में आतंकवाद से मुकाबला करना आसान होता है, क्योंकि तब आतंकियों पर जन-भावना का भी दबाव होता है जो तानाशाही में नहीं होता।

हालांकि मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं। यह सही है कि अमेरिका जैसा लोकतंत्र 9/11 के बाद आतंकी हमलों को रोकने में सफल रहा है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि वहां के नेतृत्व और लोगों ने गजब की इच्छाशक्ति दिखाई और आतंकी हमलों को रोकने के पुख्ता बंदोबस्त भी किए। लेकिन भारत में भी लोकतंत्र होने के बावजूद ऐसा नहीं हो पाया।

पिछले तीन साल में कम से कम 20 बार विदेशी आतंकियों ने हम पर हमले किए। इनमें सबसे ताजा हमला नववर्ष के पहले दिन रामपुर में हुआ जिसमें सीआरपीएफ के सात जवान मारे गए। दुर्भाग्य से भारत एक ढुलमुल देश है। हमारे यहां सरकार में इच्छाशक्ति की कमी तो है ही, नियम-कायदे लागू करने की उसकी क्षमता और भी कम है।

भाजपा कांग्रेस पार्टी पर मुस्लिमों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती है और मानती है कि इसी वजह से यूपीए सरकार आतंकवाद का ठीक से मुकाबला नहीं कर पा रही है। हालांकि इस मामले में भाजपा का उस दौर का खुद का रिकार्ड भी ज्यादा अच्छा नहीं है जब लालकृष्ण आडवाणी गृह मंत्री थे। जैसा कि भारत में ज्यादातर मामलों में होता है, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। हमारी समस्याओं की जड़ सभी सार्वजनिक सेवाओं के मामलों में किसी की जवाबदेही तय नहीं होना है।

इसका जवाब प्रशासनिक सुधारों में है। हमें सुरक्षा एजेंसियों का एकीकरण करना होगा, जिम्मेदार पदों पर तैनात किए जाने वाले लोगों का कार्यकाल सुनिश्चित करना होगा, उन्हें अधिकार संपन्न बनाना होगा तथा मानवाधिकारों का सम्मान करने के लिए प्रशिक्षित करना होगा और उनमें से सर्वश्रेष्ठ को आगे बढ़ने के मौके देने होंगे। ऐसा करने से ही हमारे सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ेगा और आतंकवाद से लड़ने की हमारी क्षमता बढ़ेगी।

भारत में हिंसा के प्रति राग-द्वेष की ऐतिहासिक परंपरा रही है। ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने अहिंसा के सिद्धांत को अपनाया था। मेरे एक गांधीवादी मित्र का कहना था कि मनमोहन सिंह सम्राट अशोक के रास्ते पर चलते हुए लगते हैं। मैंने उन्हें याद दिलाया कि सम्राट अशोक ने वैराग्य लेने के बाद भी आदिवासी समूहों को आतंकी हरकतों से बाज आने की चेतावनी दी थी।

उन्हें वैराग्य लेने के बाद भी अपनी ताकत का अहसास था। उन सरीखे व्यक्ति की राज व्यवस्था अंिहंसा पर विश्वास करने के बाद भी आतंकवाद का प्रभावी तरीके से मुकाबला कर सकती थी। अंग्रेज लेखक जॉर्ज आरवेल की राय कुछ अलग है।

उन्होंने ‘रिफ्लेक्शन्स ऑन गांधी’ में लिखा है, ‘यह कहना मुश्किल है कि गांधीजी का अहिंसा रूपी हथियार उन देशों में भी कारगर हो सकता है जहां शासकों के विरोधी रातों-रात लापता हो जाते हैं और बाद में उनका कोई पता-ठिकाना नहीं मिलता।’ उनके कहने का आशय यह था कि गांधीजी का तरीका अंग्रेजों के खिलाफ तो कारगर हो सकता है मगर हिटलर के खिलाफ नहीं, आतंकियों के खिलाफ तो कतई नहीं।

महाभारत के युधिष्ठिर बौद्ध सम्राट अशोक का हिंदू जवाब हो सकते हैं। कलिंग युद्ध के खून-खराबे के बाद अशोक अपने राजपाट की जरूरतों और अंतरात्मा की आवाज के द्वंद्व में उलझ गए थे। वे राजपाट त्यागकर बौद्ध बन गए, युद्ध की निंदा करने लगे और अपना बाकी जीवन अपनी प्रजा को अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि राजकाज चलाने की दृष्टि से उनकी स्थिति विचित्र विरोधाभासों से घिरी थी।

यदि कोई राजा हथियारों का त्याग कर देता है तो वह अपनी प्रजा को आंतरिक और बाह्य हमलों से कैसे बचाएगा? अहिंसक तरीकों से वह समाज में शांित कैसे रख पाएगा? महाभारत के शांति पर्व में युधिष्ठिर को ठीक ऐसे ही पसोपेश में दिखाया गया है।

युद्ध की विभीषिका से वे इतने शोकाकुल हो जाते हैं और उन्हें इतना पश्चाताप होता है कि वे राजपाट त्यागकर वनों की ओर प्रयाण करना चाहते हैं। तब उनके शोक को शांति में बदलने के लिए भीष्म उन्हें समझाते हैं कि किसी राजा के लिए हिंसा का त्याग कर वैरागी बन जाना ठीक नहीं है। हिंसा सांसारिक जीवन का अपरिहार्य अंग है और उससे किसी भी स्थिति में पूरी तरह निजात नहीं पाई जा सकती।

हमारा दुर्भाग्य है कि हम लोग उस देश के पड़ोसी हैं जिसे ‘द इकॉनामिस्ट’ ने दुनिया की सबसे खतरनाक जगह करार दिया है। ऐसी भयावह स्थिति के बारे में सोचते हुए हमें याद रखना होगा कि अपना अस्तित्व बनाए रखने और आगे बढ़ने की हमारी क्षमता हमारे सिद्धांतों से कहीं ज्यादा हमारी संस्थाओं पर निर्भर है। हमारा अपना तंत्र बदलाव के लिए तड़प रहा है।

मुझे नहीं लगता कि बेनजीर भुट्टो जीवित रहतीं भी तो हमें आतंकवाद से निजात दिलाने में कुछ मदद कर सकतीं। आखिरकार अपनी समस्याओं से हमें ही जूझना और निपटना होगा। हमें अपनी सभी सार्वजनिक सेवाओं में सुधार करना होगा और उन्हें जवाबदेह बनाना होगा। प्रशासनिक सुधारों के अलावा कोई भी ऐसी चीज नहीं है जो हमारे नागरिकों को अधिक सुरक्षित और अधिक सुखी बना सके।





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