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भारत रत्न पर फिजूल का विवाद

सम्पादकीय. भारतीय जनता पार्टी के शिखर नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र क्या लिख दिया गया, देश में नाहक बवाल उठ खड़ा हुआ और हमारे राजनेताओं और राजनीतिक दलों का संकीर्ण नजरिया मुखर होकर सामने आ गया।

वस्तुत: आडवाणी ने मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर न केवल भाजपा व उसके सहयोगी दलों बल्कि करोड़ों देशवासियों की भावना को अभिव्यक्ति दी है। इसमें किसी को एतराज क्यों होना चाहिए? क्या विपक्ष के नेता को इतना भी हक नहीं कि वे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कोई सुझाव दे सकें या कोई आग्रह कर सकें? स्वस्थ लोकतंत्र में यह अधिकार तो देश के हरेक नागरिक को होना चाहिए और है भी।

यह अलग बात है कि भाजपा प्रवक्ता द्वारा यह पत्र लिखे जाने की बात का खुलासा करने का तरीका अनगढ़ रहा है और यही विवाद का कारण भी है। आडवाणी के पत्र का इस तरह खुलासा नहीं किया जाता, तो यह मामला प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष तक ही सीमित रहता और विवाद तूल नहीं पकड़ता। सरकारी खेमे की यह दलील वजन रखती है कि भारत रत्न या दूसरे राष्ट्रीय अलंकरण किसे दिए जाएं, यह बात सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं हो सकती है। देश में ऐसी कोई नजीर भी नहीं है।

वाजपेयी चाहते तो प्रधानमंत्री के अपने कार्यकाल में खुद को भारत रत्न से नवाजे जाने का उपक्रम कर सकते थे। तब उन्हें और उनकी सरकार को ऐसा करने से कोई रोक भी नहीं सकता था। आखिर जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को यह अलंकरण उनके प्रधानमंत्री रहते हुए ही दिया गया था।

वाजपेयी ने ऐसा नहीं किया, तो यह उनका बड़प्पन है। अगर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार अपनी पहल पर उन्हें भारत रत्न देती तो उसी की साख बढ़ती, मगर अब इस मामले में जिस तरह की राजनीति हो रही है उसके मद्देनजर यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह इस पर विचार भी करेगी।

हकीकत है कि भारत रत्न के राष्ट्रीय अलंकरण से सम्मानित नहीं किए जाने के बाद भी वाजपेयी करोड़ों देशवासियों के मन में ऐसी कई विभूतियों से ज्यादा सम्मानित स्थान रखते हैं जिन्हें यह अलंकरण दिया गया है।

भारत रत्न के बगैर वाजपेयी का कद कम नहीं हो जाता। फिर भी वाजपेयी को भारत रत्न के रूप में देखने के इच्छुक लोगों को ज्यादा अफसोस नहीं होना चाहिए। गठबंधन सरकारों के दौर में सत्ता समीकरण कभी भी बदल सकते हैं और तब लोगों की यह इच्छा पूरी होकर रहेगी।





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