मकर संक्रांति अन्य बारह संक्रांतियों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। कर्क एवं मकर की संक्रांति अयन संक्रांति कहलाती है। अब तक 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाई जाती रही है और इसीलिए यह धारणा बनी हुई है कि मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही आती रहेगी, लेकिन यह धारणा गलत है।
आकाश स्थित ग्रहों का आधार व उनकी कुछ विशेषताएं हैं, जिन्हें हम नक्षत्र एवं राशियों के नाम से पुकारते हैं। सौर परिवार में सूर्य के चारों ओर सारे ग्रह चक्कर लगाते हैं। हम पृथ्वी पर रहते हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि सभी पृथ्वी के चक्कर लगाते हैं, लेकिन ग्रहों की अंशात्मक गणना पृथ्वी को केंद्र मानकर की जाती है। चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है और वह पृथ्वी के चक्कर लगाता है, पृथ्वी सूर्य के और सूर्य ब्लैकहोल के चक्कर लगाता है।
वैदिक वाXमय के अनुसार चंद्रलोक, पृथ्वी लोक, सूर्य लोक, परमेष्ठी लोक एवं स्वयंभूलोक इस तरह पांच लोक बताए गए हैं। वेदों में भी सूर्य परमेष्ठी मंडल के चक्कर लगाता हुआ माना गया है और परमेष्ठी मंडल स्वयं भूमंडल के चक्कर लगाता है। जब सूर्य ही अनंत ब्रrांड में चलायमान रहता है तब प्रतिवर्ष ग्रहों की खगोलीय स्थिति में थोड़ा अंतर आता रहता है।
इस अंतर के मान में यद्यपि विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन सामान्यतया 50 विकला प्रतिवर्ष अयन गति मानी गई है। मोटेतौर पर 70 से 80 वर्ष के मध्य करीब एक अंश का अंतर आ जाता है। यह अयनांश गति अधिकतम 27 अंश तक बढ़ेगी, फिर कम होने लगेगी।
आजकल 24 अंश के करीब अयनांश चल रहा है, इसीलिए सायन मकर का सूर्य तो 22 दिसंबर को ही आ जाता है, वही प्रत्यक्ष है तथा व्रतोत्सवादि के लिए एवं अन्य कार्यो के लिए निरयन ग्रहों को ग्रहण करने का विधान है, इसलिए निरयन मकर संक्रांति अयनांश बढ़ने के कारण एक दिन आगे बढ़ गई है। यह संक्रमण काल है।
इस वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्रांति आई है अब कुछ वर्ष फिर 14 में आएगी, फिर 15 में आएगी। इस तरह 14-15 का क्रम चलते-चलते एक बार फिर 70 वर्ष के लिए 15 जनवरी को ही संक्रांति आया करेगी, जिससे अगली पीढ़ी यह समझेगी कि मकर संक्रांति 15 को ही आती है। इसके बाद 16 जनवरी को भी मकर संक्रांति आएगी। 14 से पहले भी 13,12,11 आदि जनवरी को मकर संक्रांति होती आई है।
अत: मकर संक्रांति पर्व 14 को ही परंपरागत तौर पर मनाई जाए यह धारणा गलत है। सूर्य की 12 पत्नियां हैं और उनके नाम मेष, वृष, मिथुन आदि राशियां हैं। धनु में सूर्य रहने पर मलमास होता है तथा मलमास में मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। धनु में मकर राशि में संक्रमण का समय तो अति सूक्ष्म होता है, इसलिए दान-पुण्य के लिए मकर संक्रांति के बाद की 40 घटी अर्थात 16 घंटे शुभ माने गए हैं। इस बार 15 जनवरी के 00:09 मिनट पर मकर संक्रांति (निरयन) हुई है, जिसका पुण्यकाल 15 जनवरी को अपराह्न 4 बजकर 9 मिनट तक रहता है।
15 जनवरी का पुण्यकाल तो पहले भी आया है, लेकिन 15 को ही संक्रांति तथा 15 को ही पुण्यकाल पहली बार आया है। इसीलिए प्रशासनिक अधिकारियों को ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र की जानकारी न होने के कारण परंपरा को आधार मानकर कुछ जगह 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति का अवकाश घोषित कर दिया गया, जो गलत है। संक्रांतियों का निर्णय तो वर्षो पहले हो जाता है तथा ज्योतिषी, धर्मशास्त्री या पंचाXकर्ताओं से संपर्क करके अवकाश घोषित किया जाना चाहिए था।
देश के अधिकांश हिस्सों में मकर संक्रांति आज मनाई जा रही है, लेकिन कुछ जिलाधीशों द्वारा जानकारी के बावजूद गलत दिन छुट्टी की गई। अवकाश मौज-मस्ती के लिए नहीं होता, इसके पीछे यह धारणा होती है कि दान, पुण्य, संकल्प व अन्य संक्रांतिजन्य कार्य संपन्न करने में समय लगता है तथा पुण्यकाल में अनध्याय रहता है, बड़े-बुजुर्गो, रिश्तेदारों, मित्रों को शुभकामनाओं का आदान-प्रदान होता है, इसलिए पूरे दिन को अवकाश के रूप में रखने की परंपरा है।
खैर, जनता के लिए सरकारी छुट्टी मायने नहीं रखती। कई बार अधिकारी वर्ग अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर भी जनभावना के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं और भारतीय हिंदू समाज में सहनशीलता की पराकाष्ठा देखने को मिलती है।
प्राचीनकाल में मकर संक्रांति पर ऋषि आश्रमों, गुरुकुल, ऋषिकुल आदि में वेदाध्ययन का तीसरा सत्र प्रारंभ होता था। आज भी देश के विभिन्न प्रांतों में यह पर्व अलग-अलग तरह से मनाया जाता है, लेकिन शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक पुष्टि प्रदान करने वाला यह पर्व वैदिक एवं पौराणिक काल से मनाते आ रहे हैं।
संक्रांति पर्व किसी जाति-धर्म का नहीं अपितु संसार के हर जीव मात्र के लिए एक विशिष्ट पर्व है, क्योंकि सूर्य सभी धर्मो, संप्रदायों एवं समाजों के लिए वंदनीय हैं। अत: यह सर्वसमाज का पर्व सभी को मंगल फल दाता रहता है।
-लेखक ज्योतिर्विज्ञान केंद्र राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के निदेशक हैं।