अभिमत. आर्थिक अपरिहार्यताएं बहुत कठोर होती हैं। इसीलिए वे दबाव और प्रोत्साहन से परे मानी जाती हैं। ऐसे में पेट्रोल मूल्यवृद्धि पर सरकार की पिछले कई माह से जारी दुविधा चिंता का विषय है।
बार-बार बैठक बुलाए जाने के बावजूद वह इस पर कोई निर्णय नहीं कर पा रही है। यहां तक कि अगले कुछ दिनों में होने वाली मंत्रियों के समूह की बैठक में भी तय नहीं है कि मूल्य बढ़ेंगे या घटेंगे। स्वयं पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने इस बारे में असमंजस जाहिर किया है।
ऐसा राजनीतिक दबाव के कारण हो रहा है या आर्थिक कारण हैं, यह समझ से परे है। यह देखते हुए भी जब तेल कंपनियों का घाटा 69,753 करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच चुका है। सही है पेट्रोलियम पदार्थो में मूल्यवृद्धि का असर सभी पर पड़ता है, लेकिन घाटा उठाते हुए भी मूल्यवृद्धि न करना सिर्फ वामपंथी दबाव नहीं माना जा सकता है।
यह तब है जब दुनिया भर में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों को देखते हुए आम आदमी भी कहीं न कहीं मानसिक स्तर पर मूल्यवृद्धि के लिए तैयार हो चुका है। उस पर मुरली देवड़ा का यह कहना कि कीमतें बढ़ेगी भी या नहीं, अभी यह तय नहीं है कुछ और ही संकेत दे रहा है।
कहीं ऐसा तो नहीं गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों में मुंह की खा चुकी कांग्रेस इस वर्ष विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष होने वाले आम चुनाव को देखते हुए मामले पर टालमटोल कर रही है। वित्तमंत्री चिदंबरम द्वारा नरम बजट बनाने के संकेत को देखें तो इसकी संभावना अधिक नजर आती है।
बेहतर होगा कि केंद्र सरकार राजनीति और दबाव से परे हट अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के मद्देनजर कोई स्पष्ट निर्णय करे। वामपंथी दबाव या ऑटोमोबाइल क्षेत्र के विस्तार की संभावनाओं के कारण सरकार का निर्णय प्रभावित होते हुए नहीं दिखना चाहिए।