अभिव्यक्ति. मतदाताओं को अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार (राइट टु रिकाल) दिए जाने के लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के सुझाव पर देश के लोगों द्वारा समुचित ध्यान नहीं दिया जाना आश्चर्यजनक है। एक बेहद सम्मानित राजनेता और विधिवेत्ता के इस सुझाव की सावधानीपूर्वक जांच-परख की ही जानी चाहिए। चटर्जी कई मंचों से अपने सुझाव को दोहरा चुके हैं।
उनका मानना है किनिर्वाचित जन-प्रतिनिधियों को मतदाताओं के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाने के लिए ऐसा किया जाना जरूरी है। चटर्जी का कहना है कि मतदाताओं को उस स्थिति में अपने सांसदों को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए जब वे अक्षम हों, असंवेदनशील हों, भ्रष्ट हों, सांसद के नाते अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने के प्रति गंभीर नहीं हों अथवा सदन के भीतर या बाहर उनकी गतिविधियां सांसद की मर्यादा के अनुरूप नहीं हों। सांसद को वापस बुलाने के लिए ये कारण बहुत व्यापक हैं।
निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की प्रक्रिया के बारे में चटर्जी का कहना है कि मतदाता अपने प्रतिनिधि का कार्यकाल पूरा होने के पहले एक विशेष अधिकारी को याचिका देकर ऐसा कर सकते हैं। लोकसभा स्पीकर मतदाताओं को यह अधिकार दिए जाने का एक और फायदा गिनाते हैं कि इससे मतदाताओं को अपने प्रतिनिधि के कामकाज पर निगरानी रखने के लिए बढ़ावा मिलेगा।
पूर्व सांसद एरा सेझियन का कहना है कि प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार राष्ट्रपति प्रणाली वाले देशों में खासतौर पर कारगर रहता है क्योंकि वहीं विधायिका और कार्यपालिका के कामकाज पूरी तरह अलग होते हैं। राष्ट्रमंडल के देशों में से ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा, उगांडा और गुयाना में मतदाताओं को यह अधिकार हासिल है। इन देशों के अनुभवों का विस्तृत अध्ययन करके यह देखा जाना चाहिए कि वहां के मतदाताओं और जन प्रतिनिधियों के अनुभव कैसे रहे हैं।
राइट टु रिकाल के विरोधी दलील देते हैं कि मतदाताओं को यह अधिकार दिए जाने पर सांसद इस पसोपेश में पड़ सकते हैं कि या तो वे कुछ भी काम न करें या फिर यथासंभव कम से कम काम करें ताकि उन्हें लेकर कोई विवाद न खड़ा हो। इसके अलावा रिकाल की व्यवस्था का दुरुपयोग सरकार को अस्थिर करने के लिए भी किया जा सकता है।
इससे निर्वाचित सरकार का ताना-बाना ढीला पड़ सकता है और सांसद दूरदृष्टि से काम करने की बजाय मतदाताओं को स्वीकार्य कामों को ही प्राथमिकता दे सकते हैं। किसी सांसद को उसके कथित खराब व्यवहार के कारण वापस बुलाना अन्यायपूर्ण हो सकता है क्योंकि उसे वापस बुलाने वाले मतदाताओं पर अपने आरोप साबित करने की जवाबदेही नहीं होगी।
राइट टु रिकाल पर तीन पहलुओं से विचार किया जाना चाहिए- संवैधानिक, प्रशासनिक और राजनीतिक। चूंकि यह सांसदों के साथ ही विधायकों पर भी लागू होगा, इसलिए इसका प्रावधान करने के लिए संविधान संशोधन करना होगा। यानी पहले तो संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से तदाशय के संविधान संशोधन को मंजूरी देनी होगी और फिर राज्यों की विधानसभाओं को भी इसका अनुमोदन करना होगा।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारे सांसद या विधायक खुद ही अपना 'डेथ वारंट' जारी करने को तैयार होंगे। हमारे संसदीय और विधानसभा क्षेत्र काफी लंबे-चौड़े हैं। संबंधित अधिकारी को रिकाल की याचिका देने के लिए कुल मतदाताओं के 51 से लेकर 75 प्रतिशत तक की कोई भी सीमा क्यों न तय की जाए, उनके दस्तखत जुटाना बहुत मुश्किल होगा। फिर इन दस्तखतों की पुष्टि भी करनी होगी। यह काम किसी एनजीओ के बूते का नहीं है।
कोई संपन्न राजनीतिक दल ही यह काम कर सकता है। रिकाल की व्यवस्था होने पर राजनीतिक दल इसका बेजा इस्तेमाल कर सकते हैं। रिकाल का अभियान विफल रहने पर भी संबंधित सांसद की छवि तो धूमिल होगी ही। देश में पहले से ही राजनीतिक वातावरण बेहद गरम है। इसे और गरमाने की कोई जरूरत नहीं है।
चटर्जी ने रिकाल के लिए मुख्यतया दो तरह के कारण बताए हैं। पहले कारण, सांसदों की संवेदनहीनता, अक्षमता या अपने काम के प्रति उपेक्षा से संबंधित हैं। ऐसे मामलों में सांसदों पर रिकाल का अधिकार देना समस्या को कम करने की बजाय और बढ़ाने का कारण भी बन सकता है। इसकी वजह से दो चुनावों के बीच में राजनीतिक गहमागहमी बढ़ सकती है।
दूसरा कारण सांसदों के कदाचरण या भ्रष्टाचार से जुड़ा है। इसका निदान रिकाल नहीं बल्कि कानून को सख्त बनाना है। सन 1998 में सुप्रीम कोर्ट के 3-2 के बहुमत से दिए गए एक निर्णय के अनुसार किसी सांसद या विधायक को रिश्वत देने की पेशकश करने वाला तो अपराधी माना जाता है मगर सांसद या विधायक पर आरोप नहीं लगाया जा सकता। यह फैसला बदले जाने की जरूरत है। इसके अलावा संसदीय निगरानी में भी कड़ाई बरती जानी चाहिए।
लेकिन लोगों के जागरूक न होने या चरित्र में कमी की भरपाई किसी यांत्रिक व्यवस्था से नहीं की जा सकती। 1972-75 के लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का यही आधार था। उन्होंने 1972 में अंग्रेजी साप्ताहिक 'एवरीमैन्स' में लोकपाल, भ्रष्टाचार उन्मूलन, भिन्न राय रखने के अधिकार आदि पर कई लेख लिखे थे।
उन्होंने एक लेख में लिखा था, 'भारत में जिस तरीके से चुनावी चंदा इकट्ठा किया जाता है, जिस तरह से चुनावों में भारी-भरकम खर्च किया जाता है, जिस तरह से बूथों पर कब्जा किया जाता है और जिस तरह से फर्जी मतदान होता है उस सबके मद्देनजर चुनावों के महज औपचारिकता बनकर रह जाने का खतरा है।' उन्होंने लिखा था कि बढ़ता राजनीतिक भ्रष्टाचार समग्र राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है।
निजी और सरकारी कारोबार, प्रशासन, व्यवसाय, शिक्षा, परंपरा, लोक व्यवहार और निजी संबंध तक अछूते नहीं रहे हैं। जेपी ने सवाल उठाया था, 'नैतिक ताने-बाने के बगैर क्या कोई देश जिंदा रह सकता है? इस सवाल का जवाब केवल राजनेताओं को नहीं देना है। इसका जवाब हम सबको देना है।' उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई थी कि देश में चतुर्दिक नैतिक पतन हो रहा है और सार्वजनिक जीवन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है।
कम-ज्यादा का अंतर भले ही है। उन्होंने अंत में समस्या की तह में जाते हुए सवाल किया था, 'क्या नैतिकता के बगैर लोकतंत्र चलता रह सकता है?' यांत्रिक उपायों से समस्या हल नहीं हो सकती। जेपी द्वारा 35 साल पहले लिखी गई ये पंक्तियां मौजूदा हालात में भी बखूबी लागू होती हैं। तब से हालात सुधरने की बजाय बिगड़े ही हैं।
-लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।