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राजनेताओं से परे तलाशिए 'भारत रत्न'

सत्तर के दशक में जब मैं एक अंग्रेजी भाषा के कवि के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब एक सर्द सुबह मुझे पता चला कि मुझे पद्मश्री से अलंकृत किया गया है। तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और मैं 30 बरस का भी नहीं हुआ था। पद्मश्री के लिए चुना जाने वाला मैं संभवत: अंग्रेजी का पहला कवि था।

तब से अब तक राष्ट्रीय अलंकरणों के सम्मान और प्रतिष्ठा में लगातार कमी आती गई है। इसकी कई वजहें रही हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि हर साल बड़ी संख्या में दिए जाने वाले इन अलंकरणों के लिए जबरदस्त लॉबिंग की जाती है और हरेक राजनीतिक दल काबिल-नाकाबिल लोगों का नाम आगे बढ़ाकर इन अलंकरणों में अपनी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की जुगत करता है।

इन अलंकरणों के लिए चुने जाने वाले कुछ नाम तो ऐसे होते हैं जिनकी वजह से अलंकरणों की कोई अहमियत नहीं रह जाती। लेकिन हमारे नेता हैं कि इस तथ्य को समझने और स्थिति में सुधार की बजाय ठीक उलटा कर रहे हैं।

पिछले हफ्ते कम से कम दर्जनभर राजनेताओं को भारत रत्न दिए जाने के लिए खुले तौर पर लॉबिंग की गई। इनमें से पांच अब इस दुनिया में नहीं हैं। मेरा मानना है कि इस तरह की लॉबिंग शर्मनाक और बीमार मानसिकता की परिचायक है। कहना न होगा कि 2008 के आधुनिक भारत में देश के ज्यादातर लोग किसी राजनेता को पुरस्कृत होते नहीं देखना चाहते।

आजादी के साठ साल में हमें साफतौर पर पता चल चुका है कि हमारे यहां सत्ता में रहने वाले लोग कितने धूर्त और भ्रष्ट हैं। राजनेताओं और अफसरशाहों में शायद ही कोई हमारा रोल मॉडल बनने की पात्रता रखता हो। मैं एक ऐसे मध्यवर्गीय बंगाली परिवार में पला-बढ़ा हूं जहां गांधी, टैगोर और सुभाष के चित्र ड्राइंग रूम और लिविंग रूम में दीवारों की शोभा बढ़ाते रहे हैं।

अब मुझे एक भी ऐसा घर नजर नहीं आता जिसकी दीवारों पर राजनेताओं के चित्र टंगे हों। आखिरी बार शायद दो दशक पहले मैंने किसी घर की दीवार पर किसी राजनेता का चित्र देखा होगा। अब अखबारों में भी राजनेताओं के चित्रों का इस्तेमाल बहुत कम हो गया है।

कई दफा तो ये चित्र तब छपते हैं जब कोई नेता किसी घोटाले में फंसा होता है। साफ है कि हमारे नायक बदल चुके हैं। यही कारण है कि किसी राजनेता को भारत रत्न दिए जाने की मांग से जुड़ी खबरें पढ़कर ज्यादातर लोगों को निराशा होती है। लोग इसे भाई-भतीजावाद के पीड़ाजनक उदाहरण के रूप में ही देखते हैं।

अटलबिहारी वाजपेयी एक अच्छे व्यक्ति, अच्छे चिंतक और अच्छे राजनेता हैं, लेकिन क्या इतने भर से वे भारत रत्न के पात्र हो जाते हैं? ज्योति बसु गैर परंपरागत और अनूठे मार्क्‍सवादी हैं। सभी यह भी जानते हैं कि ज्योति बसु भद्रलोक का प्रतिनिधित्व करते हैं। पर क्या वे भारत रत्न के पात्र भी हैं? मेरी राय में तो नहीं।

कांशीराम ने अपने समाज के लिए काफी कुछ किया और राजनीति में दलितों की उपस्थिति दर्ज कराने में महती भूमिका निभाई। लेकिन वे भी ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिसे आधुनिक भारत के लोग भारत रत्न के रूप में देखना पसंद करें। यही स्थिति जगजीवनराम की है जो लंबे समय तक कर चुकाना भूले रहने के लिए भी याद किए जाते हैं। मैं मुलायम सिंह सरीखे व्यक्तियों की खासतौर पर प्रशंसा करता हूं मगर मैं उन्हें भी भारत रत्न दिए जाने का समर्थन नहीं करूंगा।

इस सिलसिले में चरण सिंह, कपरूरी ठाकुर या बीजू पटनायक की चर्चा न ही की जाए तो बेहतर होगा। हकीकत है कि मौजूदा दौर का एक भी राजनेता मुझे भारत रत्न के काबिल नहीं लगता है। हमें उस पुरानी मानसिकता से बाहर निकलना होगा जिसमें सारे राष्ट्रीय सम्मानों, रियायती दरों वाले मकानों और दूसरी सुविधाओं पर नेता, अफसरशाह और उनके आगे-पीछे घूमने वाले लोग कब्जा जमा लेते हैं।

लोग इस शर्मनाक प्रवृत्ति से मुक्ति चाहते हैं। वे ऐसे सम्मान पूरी तरह भिन्न लोगों को दिए जाने की इच्छा रखते हैं। वह व्यक्ति किसी भी क्षेत्र से हो सकता है-अमत्र्य सेन जैसा अर्थशास्त्री, विश्वनाथन आनंद जैसा खिलाड़ी, रतन टाटा जैसा उद्योगपति, तैयब मेहता जैसा पेंटर। जब बिस्मिल्लाह खान और लता मंगेशकर को भारत रत्न दिया गया, तब सभी ने इसकी सराहना की थी।

हबीब तनवीर जैसा नाट्यकर्मी, बिरजू महाराज जैसा नर्तक या बाबा आमटे जैसा समाजसेवी इसका हकदार क्यों नहीं हो सकता? आधुनिक भारत इन जैसे लोगों का सम्मान करता है और इन्हीं को सम्मानित होते हुए देखना चाहता है।

मेरी बात पर यकीन न हो तो किसी दूसरे व्यक्ति से पूछ लीजिए। लोग तो राष्ट्रपति भवन में भी किसी राजनेता को देखना पसंद नहीं करते हैं। वे ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित होते देखना चाहते हैं जो राजनीति से परे हों, विचारवान और कल्पनाशील हों, जिनके लिए उनके मन में प्रेम उमड़ता हो और जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं।

हमारे राजनेता इस भूमिका में खरे नहीं उतरते। जहां तक भारत रत्न का सवाल है, ऐसे बहुतेरे लोग हैं जो इसकी पात्रता रखते हैं मगर पहले राजनेता उनके लिए रास्ता तो साफ करें।





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