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अभिमत. गठबंधन सरकार चलाना दोधारी तलवार पर चलने के बराबर होता है। झारखंड और गोवा सरकार इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहां की सरकारों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। गोवा में कांग्रेसनीत गठबंधन सरकार है, वहीं झारखंड में कांग्रेस समर्थित निर्दलीय मुख्यमंत्री है।
नफे-नुकसान के इस खेल में जहां कांग्रेस झारखंड में मधु कोडा सरकार से हाथ झाड़ने का यह बेहतर अवसर मान रही है, वहीं गोवा में दिगम्बर कामत सरकार को बचाने के लिए वह एक बार फिर स्पीकर की मदद लेती नजर आ रही है। दोनों ही जगह सरकार चलाने या न चलाने के पीछे तर्क वही हैं, जो कांग्रेस को मुफीद लग रहे हैं।
झारखंड में उसने परंपरा के विपरीत जाते हुए एक निर्दलीय मधु कोडा को मुख्यमंत्री बनाया था, सिर्फ इसलिए कि भाजपा सरकार बनाने न पाए। अब कांग्रेस विकास और भ्रष्टाचार से किसी कीमत पर समझौता न करने की दुहाई दे कोडा सरकार को गिराना चाह रही है।
हालांकि मुख्यमंत्री कोडा अपनी सरकार की रिपोर्ट कार्ड कांग्रेस को पेश कर सरकार के बचे रहने के प्रति आश्वस्त दिख रहे हैं, लेकिन संकेत यही कह रहे हैं कि कांग्रेस इस मौके को हाथ से नहीं जाने देगी।
उधर, गोवा में सात माह बाद फिर से दोहराए जा रहे नाटक में एनसीपी के मंत्रियों व विधायकों ने कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत को मुश्किल में डाल दिया है, जबकि एनसीपी प्रमुख शरद पवार इस घटनाक्रम से स्तब्ध हैं। कांग्रेस ने बजाय स्थिति का राजनीतिक हल ढूंढ़ने के, गोवा विधानसभा का ही सत्रावसान करके मामला दबाने की कोशिश की है।
जाहिर है कि भाजपा को यह स्थिति रास नहीं आ रही है और पार्टी 'इंतजार करो और देखो' की नीति अपनाने के बाद सरकार बनाने की संभावनाओं पर उचित कदम उठा सकती है। होना तो यह चाहिए कि राज्य सरकार का फैसला उसी राज्य के विधायक राज्य विधानसभा में करें। लेकिन इस तरह की परंपराओं का शायद अब बहुत अर्थ रह नहीं गया है।