|
दृष्टिकोण. हाल के वर्षो में भारत ने जो लंबी छलांग लगाई है वह लगभग 15 वर्षो से जारी सुधारों का परिणाम है। वर्ष 2006-07 में सकल घरेलू उत्पाद की 8 फीसदी दर पार करने के बाद भारत ने उच्च बचत दर समेत स्थिर ब्याज और कम मुद्रास्फीति बरकरार रखते हुए विकास की गति को निरंतरता प्रदान करने में सफलता हासिल की है।
सर्विस सेक्टर से मिलने वाले नियमित सहयोग के अलावा निर्माण और ढांचागत सुविधाओं के मोर्चे पर मिले सहयोग से तस्वीर और उजली ही हुई है। अगर योजनाओं को आधार बनाया जाए तो पांच वर्षो बाद भारत की एक दूसरी ही तस्वीर हमारे सामने होगी, जो आज की विद्यमान स्थितियों से सर्वथा भिन्न होगी। कम से कम ढांचागत सुविधाओं के क्रम में तो यह बात निश्चित तौर पर कही जा सकती है।
पिछले तीन-चार वर्षो से भारतीय ऊर्जा क्षेत्र में 17 से 18 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार ऊर्जा क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किए हुए है ताकि क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता सुधार और पारेषण को मजबूत बनाया जा सके। इसके अलावा राज्य विद्युत बोर्डो के निजीकरण की दिशा में भी सरकार प्रयास शुरू कर चुकी है। अगले तीन वर्षो में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 35,000 मेगावाट से लेकर 40,000 मेगावाट क्षमता की उत्पादन इकाइयां स्थापित करने की योजना है।
इसके अलावा दिल्ली, मुंबई, बेंगलूर और हैदराबाद में चार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे प्रस्तावित हैं। विजयवाड़ा और नागपुर हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण होना है। प्रतिवर्ष 97 फीसदी की विकास दर के साथ भारत का संगठित रिटेल क्षेत्र अगले पांच वर्षो में एक महत्वपूर्ण आकार ले लेगा। ढांचागत सुविधाओं के विकास के क्रम में निवेश के लिए यह संकेत पर्याप्त हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर भारत को अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी चीन से ढांचागत सुविधाओं के प्रत्येक क्षेत्र में कड़ा मुकाबला करना होगा।
वर्ष 2006-07 में भारत में कुल ढांचागत निवेश 31.2 बिलियन डॉलर था, जबकि इसी अवधि में चीन ने 277.9 बिलियन डॉलर का निवेश ढांचागत विकास में किया। अगर अलग-अलग क्षेत्रों को देखें तो भी चीन का यातायात, सड़क निर्माण, हवाई अड्डे, विद्युतीकरण और शहरी ढांचागत विकास में निवेश भारत की तुलना में छह से 13 गुना अधिक है। संभवत: भारत की उल्लेखनीय प्रगति भारत के अपने मानकों से ही अच्छी कही जा सकती है।
विश्व महाशक्ति बनने के प्रयास में भारत को त्वरित गति से अपने संसाधनों के अधिकतम दोहन की अनिवार्यता समझ आ गई है। अर्थव्यवस्था का प्रत्येक क्षेत्र, भले ही वह ढांचागत विकास हो या तेल-गैस, फार्मास्यूटिकल, आटोमोबाइल या फिर इंजीनियरिंग भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उदय का साक्षी बन रहा है। यह तब है जब विकसित अर्थव्यवस्था की तुलना में विकासशील अर्थव्यवस्था में काम करने का फायदा आकर्षक ब्याज दरों पर निवेश जुटाने के क्रम में कम ही होता है।
फिर उत्पाद की ऊंची कीमतें भी बाजार में प्रोत्साहन नहीं पा पाती हैं। ऐसे में सामने आ रही इन कंपनियों को विकसित देशों में प्रवेश से कुछ खास फायदे जरूर होते हैं। भारत में आर्थिक स्वतंत्रता, खुला बाजार समेत राजनीतिक लोकतंत्र का व्यापार को अच्छा सहयोग प्राप्त होता है। चीन में दो चीजें तो हैं लेकिन लोकतंत्र नहीं है। भारत के पास तीनों ही हैं और इसीलिए वह नाटकीय लगने वाली विकास दर को अपनाए हुए है। इसके अलावा भारत के पक्ष में अन्य प्रतिस्पर्धी लाभ भी हैं, मसलन भारतीय मेहनती होते हैं, जिम्मेदारी से इतर और समय सीमा से बाहर जाकर भी काम करने से नहीं हिचकते हैं।
संबंध आधारित सामाजिक-पारिवारिक ढांचा मालिकों को अपने कर्मचारियों से दीर्घकालिक संबंध बनाने में मदद करता है। भारतीय नई, अपरिचित स्थितियों को कहीं तेजी से आत्मसात करते हैं। बुद्धिमान और प्रतिभाशाली श्रमशक्ति की उपलब्धता व्यापार की लागत कम कर देती है। फिर भारत को शेष विश्व की तुलना में सबसे युवा श्रमशक्ति की उपलब्धता का प्रमुख लाभ मिल रहा है।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए ही भारतीय कंपनियों ने अब युवा प्रतिभाओं की क्षमता, रचनात्मकता पर विश्वास करते हुए अग्रिम मोर्चे पर उन्हें तैनात करना शुरू कर दिया है। तमाम दिग्गज भारतीय कंपनियों ने भारी प्रक्रियागत बदलाव करके अपनी गुणवत्ता में उल्लेखनीय मापदंड स्थापित किए हैं। इससे हालिया दौर में न सिर्फ उन्हें वैश्विक स्तर पर सम्मान और प्रतिष्ठा की नजर से देखा जा रहा है, बल्कि उनके व्यापार में भी नाटकीय बदलाव आया है।
ऐसे प्रोत्साहन वाले माहौल में भारत की तमाम कंपनियां अब विश्व की सर्वश्रेष्ठ कंपनी बनने की राह पर हैं। अब वे सिर्फ क्षेत्रीय कंपनियां ही नहीं कहलाना चाहती हैं। तमाम फायदों और नपे-तुले कदम उठाने के बावजूद समग्र भारत और भारतीय कंपनियों को कई स्तरों पर सुधार की जरूरत है। बाजारीकृत अर्थव्यवस्था के और आगे विस्तार के लिए जरूरी संस्कृति और नियम-कायदे अभी भी सही जगह पर नहीं हैं। कारण, उनसे जो बदलाव आएगा उसे समाज स्वीकारने को तैयार नहीं है।
एक आम धारणा है कि राजनीतिक तंत्र भारतीय व्यापार की विकास दर को थामने का काम कर रहा है। राज्य विद्युत बोर्ड सरीखे सार्वजनिक क्षेत्रों का अभी भी प्रभुत्व बना हुआ है। ऊर्जा क्षेत्र में लागत तक नहीं निकल पा रही है और परिवहन समेत रेल विभाग अतिरिक्त और अनावश्यक सब्सिडी के बोझ तले दबे जा रहे हैं। तमाम आर्थिक, ग्रामीण और श्रम सुधार आधे-अधूरे पड़े हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त शहरी श्रमशक्ति की तुलना में अशिक्षा ग्रामीण और शहरी लोगों के बीच की खाई बढ़ा रही है।
मानवाधिकारों की रक्षा और मानवीय मूल्यों के संरक्षण में भी भारत शेष विश्व से काफी पीछे खड़ा है। भुखमरी से होने वाली मौतें, कम प्रतिव्यक्ति आय, महिला सशक्तीकरण और बाल श्र्रम की दिशा में अभी भी भारत को एक लंबा सफर तय करना है। तेज विकास का पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिससे आगे चलकर निपटना पड़ेगा।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सापेक्ष भारतीय कंपनियों के सम्मुख जो एक महत्वपूर्ण समस्या मुंह बाए खड़ी है वह है वैश्विक मैनेजरों की अपर्याप्त आपूर्ति, जिसके बगैर वैश्विक परिदृश्य पर छाप छोड़ना मुश्किल होगा।
-लेखक लॉरसन एंड टूब्रो लिमिटेड में प्रेसीडेंट (ऑपरेशंस) और बोर्ड सदस्य हैं।