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संपादकीय. इस साल की शुरुआत से ही देश के विभिन्न हिस्सों से महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और अन्य तरह से यौन उत्पीड़न की घटनाओं की खबरों की बाढ़-सी आई हुई है। इस परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील का यह कहना सर्वथा उचित है कि बालिकाओं को शारीरिक रूप से मजबूत और आत्मविश्वास से भरा होना चाहिए तथा इसके लिए उन्हें शुरू से ही जूडो-कराटे और आत्मरक्षा की अन्य कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रपति ने समाज में ऐसी मन:स्थिति बनाने पर भी जोर दिया है जिसमें बालिकाओं को बोझ नहीं बल्कि वरदान समझा जाए और उनके सशक्तीकरण के लिए उन्हें जरूरी प्रशिक्षण दिया जाए। स्त्री-पुरुष की समानता में विश्वास रखने वाला कोई भी समाज राष्ट्रपति के इन विचारों से सहमति ही जताएगा मगर किसी विचार से सिद्धांतत: सहमत होना अलग बात है, उस पर व्यवहार रूप में अमल करना अलग बात है।
हमारे देश और समाज में आमतौर पर ऐसा ही हो रहा है और महिला सशक्तीकरण के तमाम नारों के बावजूद अधिसंख्य महिलाओं के लिए समान अधिकार की बात दूर के ढोल की ही तरह है। घर हो, दफ्तर हो या फिर कोई सार्वजनिक स्थान ही क्यों न हो, महिलाएं कहीं भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। महानगरीय परिवारों के कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर महिलाओं को यह तक पता नहीं है कि आर्थिक स्वतंत्रता किस चिड़िया का नाम है।
यहां तक कि ज्यादातर कामकाजी महिलाओं को भी आर्थिक फैसले प्राय: घर के पुरुष सदस्यों से पूछकर ही लेने होते हैं। वह पुरुष पिता, पति या भाई भी हो सकता है। फिल्मों और टीवी सीरियलों में हम आमतौर पर जिन स्वतंत्र, स्वच्छंद और गर्वीली आधुनिकाओं को देखते हैं वे हमारे आसपास के समाज में अमूमन अपवाद के तौर पर ही दिखती हैं।
दरअसल, परंपरा से पुरुषप्रधान रहे समाज में महिलाओं के लिए वास्तविक अर्थो में समानता हासिल करना एक क्रमिक और धीमी प्रक्रिया है। यह समानता हासिल करने में महिलाओं की अपनी मानसिकता भी कम बाधक नहीं है। हकीकत है कि आज भी हमारे समाज में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा स्वयं को पुरुषों की तुलना में कमजोर और हीन मानता है। महिला सशक्तीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए इस मानसिकता का बदलना बेहद जरूरी है।
यह बदलाव तभी संभव है जब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और राजनीतिक रूप से अधिकार-संपन्न हों। पुरुष खुद-ब-खुद उन्हें ये दोनों चीजें तो देने से रहे, इन्हें हासिल करने के लिए उन्हें खुद ही पहल करनी होगी। यही आर्थिक आत्मनिर्भरता और राजनीतिक अधिकार-संपन्नता ही महिलाओं को सशक्त और पुरुषों के बराबर खड़े होने के योग्य बनाएगी।