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दोनों हवेलियां सरकारी

जयपुर. राजस्थान क्रिकेट संघ के अध्यक्ष ललित मोदी की कंपनी द्वारा आमेर में पिछले साल खरीदी गईं दोनों हवेलियां सरकारी हैं। बेचने वालों ने नल, बिजली और गृहकर की रसीदों के आधार पर अपना पुराना कब्जा बताते हुए इस कंपनी को दोनों हवेलियां बेच दीं। अब मोदी और सरकार ही इन हवेलियों को निजी बता रहे हैं। हैरतअंगेज यह है कि दोनों ही हवेलियों की रजिस्ट्री में साफ लिखा है कि वे केवल कब्जे के आधार पर इन हवेलियों को बेच रहे हैं।

यहां तक कि मालिकाना हक के नाम पर दोनों ही विक्रेताओं ने वर्ष 2005-06 के बिजली, पानी के बिल और हाउस टैक्स की कुछ पुरानी रसीदें लगाई हैं। इसके बावजूद पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग ने रजिस्ट्री कर दी। मुद्रांक विभाग के अफसर अब कह रहे हैं कि स्टाम्प एंड रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत बिकने वाली संपत्ति का टाइटल देखना आवश्यक नहीं है।

इधर, राजस्थान बार काउंसिल ऑफ राजस्थान के पूर्व चेयरमैन जहूर अहमद नकवी का कहना है कि केवल बिजली-पानी के कनेक्शन लेने या गृहकर जमा कराने मात्र से किसी को भी संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिल सकता। यहां तक कि यदि कोई नियमन की राशि भी जमा करवा दे और पट्टा जारी नहीं हो तो भी उसे मालिकाना हक नहीं मिल जाता। इस बिंदु पर विभिन्न अदालतों के कई फैसले हैं।

वरिष्ठ एडवोकेट अजीत भंडारी का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का संपत्ति पर 60 साल से लगातार कब्जा चला आ रहा हो तो उसे मालिक माना जा सकता है। जब तक मालिकाना हक नहीं मिल जाता तब तक तो वह संपत्ति सरकारी ही मानी जाएगी।

नगर पालिका ने दिए थे अतिक्रमण हटाने के नोटिस:

आमेर में विकास भट्टाचार्य सहित कई लोगों को दिसंबर, 1988 में अतिक्रमी मानते हुए बेदखल करने का नोटिस दिया था। भट्टाचार्य ने इस नोटिस को यह कहते हुए कोर्ट में चुनौती दी कि उन्हें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत सुनवाई का अवसर और नोटिस दिए बिना बेदखल नहीं किया जाए। इस पर अदालत ने नगर निगम को पाबंद किया था कि बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए प्रार्थीगण को न तो मकान से बेदखल किया जाए और न ही उनके उपयोग या उपभोग में किसी तरह की बाधा डाली जाए।

इसी आदेश के आधार पर भट्टाचार्य ने मोदी की कंपनी को हवेली बेच दी। यही स्थिति शंभूराम भट्टाचार्य की हवेली की है। उसकी पत्नी ने भी हवेली के मलवे और मकान पर 50 साल पुराना कब्जा बताते हुए नल-बिजली के कनेक्शन और गृहकर की रसीदों के आधार पर हवेली का बेचान कर दिया।

सरकार ने पहले किया था रजिस्ट्री नहीं करने का आग्रह :

आमेर महल के आसपास भवनों की बेनामी खरीद-फरोख्त की आशंका होने पर राजकीय संग्रहालय आमेर के अधीक्षक ने दो साल पहले पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग को पत्र लिखकर कहा था कि संरक्षित क्षेत्र में किसी भी भवन की रजिस्ट्री उनकी सहमति के बिना नहीं की जाए। अब संग्रहालय अधीक्षक जफर उल्ला कहते हैं कि उन्होंने यह मामला निदेशालय को भिजवा दिया था।

बाद में निदेशालय स्तर पर कमेटी बनाकर कोई निर्णय लिया गया। निर्णय की मुझे जानकारी नहीं है, आप निदेशक से बात करें। निदेशक बी.एल. गुप्ता ने इस मामले में कुछ भी कहने से इनकार करते हुए संग्रहालय अधीक्षक जफर उल्ला से ही बात करने को कहा।

हां कब्जे के आधार पर बेची है हवेली:

हवेली बेचने वाले विकास भट्टाचार्य का कहना है कि वे इस संपत्ति पर वर्ष 1969 से ही काबिज हैं। पहले नगर पालिका में नियमन की फाइल चला रखी थी। नगर पालिका ने इसमें किसी और का कब्जा भी बता दिया था। इसके लिए 14 साल तक अदालत में केस लड़ा और वहां से कब्जे से बेदखल नहीं करने का आदेश मिलने के बाद मैंने हवेली बेच दी। अब मेरे पास कोई कागज नहीं है।

हमारे कब्जे में थी, इसलिए बेच दी:

दूसरी हवेली के विक्रेता गीतादेवी भट्टाचार्य के पुत्र विमलेश भट्टाचार्य का कहना है कि इस मामले में मैं आपको ज्यादा खुलकर नहीं बता सकता। आमेर के बंगाली पाड़ा में शिलादेवी मंदिर के पुजारी और उनके परिवार के लोग बरसों से रहते आ रहे हैं। हमारे परिवार की कई पीढ़ियां इस हवेली में गुजर गई। यह हमारे कब्जे में थी, इसलिए हमने बेच दी।

विक्रेताओं ने खुद कहा सरकारी है संपत्ति

मुकदमा नंबर 8/91, विकास भट्टाचार्य बनाम नगर निगम। इस प्रकरण में विकास ने कोर्ट में 6 मई, 1995 को बयान दर्ज कराए थे। बयान में कहा गया है कि मैं जानता हूं कि यह जमीन नगरपालिका आमेर की है। मैंने नगरपालिका से जमीन खरीदने के लिए पैसा जमा नहीं कराया है, लेकिन इसके लिए प्रार्थना पत्र दिया था। इस फैसले के बाद नगर निगम ने इन प्रकरणों में आगे कोई कार्रवाई नहीं की।

निगम के हवामहल जोन पश्चिम के आयुक्त उपेन्द्रनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि यह पुराना मामला है, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। भट्टाचार्य की शिकायत के आधार पर उप जिलाधीश आमेर के यहां चले एक प्रकरण की जांच में यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आया था कि यह भूमि आमेर के सिटी सर्वे रिकॉर्ड में मिल्कियत सरकार दर्ज है। इसका खसरा नंबर 231 च, छ, ज, झ है।





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