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Chandigarh Chandigarh चंडीगढ़ .
देशभर में एजूकेशन जहां मुनाफे का सबसे बड़ा कारोबार बन गई है वहीं गुरदासपुर जिला में बाबा आया सिंह रियाड़की कॉलेज तुगलवाला ऐसा शैक्षणिक संस्थान है जो आज भी इस रिवायत से अछूता है। सेवा, सहयोग, सादगी और सद्भाव की बुनियाद पर दोआब नदी के किनारे रियाड़की क्षेत्र के गांव तुगलवाला में स्थित इस संस्थान की स्थापना 1925 में बाबा श्री आया सिंह ने की थी। शुरू में यह कन्या पाठशाला थी। बाद में यहां ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन भी कराई जाने लगी। स्वयं सेवा पर आधारित यह संस्थान नकल के वायरस से बचा हुआ है। यहां नियमित शिक्षक कम, छात्र-शिक्षक ज्यादा हैं, जो खुद तो पढ़ते ही हैं निचली कक्षाओं को भी पढ़ाते हैं। यहां दसवीं तक को-एड और आगे की क्लासेज सिर्फ गल्र्स के लिए हैं। पूरी तरह सेल्फ डिपेंडेंट यह संस्थान अपनी इन्कम के संसाधन विकसित किए हुए है।
15 एकड़ में :
करीब 15 एकड़ में फैले इस संस्थान में प्राइमरी, हाई, सीनियर सैकंडरी, बीए और एमए क्लासेज फैकल्टी के अलावा स्टूडेंट्स के सहयोग से करीब 10 एकड़ में खेती-बाड़ी भी होती है। लड़कियों की बड़ी तादाद से होस्टल की कैपेसिटी का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। यहां के हॉस्टल में करीब 2400 स्टूडेंट्स रहती हैं।
जूनियर की पढ़ाई सीनियर का जिम्मा :
यहां सिर्फ 5 टीचर हैं। 4000 स्टूडेंट्स वाले इस संस्थान में पढ़ाई समूहों में होती है। पहले चरण में एक स्टूडेंट सौ स्टूडेंट्स को एक समूह में पढ़ाता है। फिर 10-10 के समूहों को पढ़ाया जाता है। पढ़ाई में कमजोर छात्रों पर तव्वजो दी जाती है।
कॉलेज की गर्ल स्टूडेंट्स कमेटियों के जरिए शिक्षक, क्लर्क और प्रिंसिपल तक का सारा काम संभालती हैं। कमेटियां सभी स्टूडेंट्स वर्कर को स्वयं सेवा, स्व-निर्भरता और सद्चित्त जैसे मूल्यों के प्रति सचेत करती रहती हैं।
डेयरी का काम, होस्टल के लिए अनाज और सब्जियां गल्र्स खुद उगाती हैं। साफ-सफाई और खाना बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की ही है। अपने बर्तन भी स्टूडेंट्स को ही साफ करने होते हैं।
छह भागों में दिनचर्या:
शुरुआत गुरबाणी पाठ, शबद कीर्तन और अरदास से होती है। इसके बाद नाश्ता और फिर साफ-सफाई। इसके बाद कक्षाएं लगती है। बीच में लंच, उसके बाद सांध्य बेला की पढ़ाई होती है।
गजटेड हॉलीडे नहीं:
कॉलेज में गजटेड छुट्टी नहीं होती। सभी धर्म गुरुओं-अवतारों की जयंती और शहीदी दिवस पूरी श्रद्धा व उत्साह से मनाए जाते हैं।
गाइडों और नकल का नाम नहीं:
गाइडों और नकल का यहां कोई स्थान नहीं। परीक्षा के वक्त उड़न दस्ते के नाम पर गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी का एक मुलाजिम खाना-पूर्ति को आता है और सीलबंद लिफाफों को खोलता है। बाकी सारा काम स्टूडेंट्स करते हैं। इतना आदर्श पेश करने के लिए संस्थान को पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की ओर से 35 हजार का पुरस्कार मिल चुका है।
100 परसेंट रिजल्ट:
नर्सरी से एमए तक का रिजल्ट हंड्रेड परसेंट होता है। हर साल बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स मेरिट में भी जगह बनाते हैं
जन-जागृति मुहिम:
स्टूडेंट्स संस्थान के आस-पास के गांवों में सामाजिक बुराइयों खिलाफ चेतना रैलियां निकालती हैं और इनसे जुड़ी लोगों की दिक्कतें दूर करने का प्रयास करती हैं।
आय के कुछ ठोस साधन
यह संस्थान सरकार या किसी भी संस्था से कोई ग्रांट या अनुदान नहीं लेता है। बैंक में जमा स्टूडेंट्स की फीस के ब्याज से संस्थान का ज्यादातर काम होता है। जो थोड़ी-बहुत कमी रह जाती है उसे आटा चक्की, धान छानने की मशीन, गन्ना पिराई की मशीन और सौर ऊर्जा पंप की आय से पूरा किया जाता है। बिजली सौर ऊर्जा से मिलती है।
संस्थान के खुशनुमा पहलू
- 4000 स्टूडेंट्स, सिर्फ पांच टीचर।
-बड़ी कक्षाओं के हवाले छोटी कक्षाएं।
- कोई गजटेड हॉलीडे नहीं।
- सभी को पूरी तरह व्यावहारिक शिक्षा।
-नकल या निठल्लपन को जगह नहीं।
-हर क्लास की सालाना 800 रुपए फीस।
-निर्धन बच्चों से कोई फीस नहीं।
-हॉस्टल में रहने वाली गल्र्स से साल भर का लिया जाता है मात्र 5000 रुपए।
-नकल होने की बात साबित करने वाले को 31 हजार रुपए का नकद इनाम।
इसी स्कूल में पढ़े हैं प्रिंसिपल संस्थान के प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह की शिक्षा-दीक्षा भी इसी स्कूल से हुई है। 1975-76 में किसानों की समस्या का उन्होंने गांधीवादी तरीके से समाधान करवाना था। इस बीच इमरजेंसी की घोषणा के साथ उन्हें भी नेता मान पटियाला जेल में डाल दिया गया। जेल में भी उन्होंने साफ-सफाई और कैदियों की शिक्षा की मुहिम चलाई।
वहां से रिहाई के कॉलेज के काम में जुट गए। इसके बाद आतंकवाद का दौर में उन्हें आतंकियों और पुलिस दोनों का कोपभाजन बनना पड़ा। पंजाब के उस काले दौर में स्वर्ण सिंह ने 150 अनाथ लड़कियों को अपने संस्थान में पढ़ाया-लिखाया और उनका घर बसाया। इनमें से कई लड़कियां संस्थान के ही काम को समर्पित हो गई हैं। स्वर्ण सिंह का परिवार भी परिसर में रहते हुए चौबीस घंटे संस्थान के कामों में व्यस्त रहता है।