Breaking News 
bhaskar Web English


HomeVichaar Vichaar

भरोसा खोता जा रहा है हमारा पुलिस तंत्र

देश के लोगों के मन में यह जिज्ञासा रहती है कि ऊंची पहुंच रखने वाली हस्तियों से जुड़े विभिन्न मामलों में जांच एजेंसियों की जांच निष्पक्ष होती है या फिर ऐसे दबाव में होती है कि जांच का नतीजा आरोपी के लिए मददगार हो। प्रियदर्शिनी मट्टू, जेसिका लाल और मधुमिता की हत्या के मामले और जम्मू-कश्मीर सेक्स स्कैंडल व गुजरात दंगे कुछ ऐसे मामले हैं जिनकी जांच के निष्कर्षो को लेकर आशंका के बादल छंटने का नाम नहीं लेते हैं।

पुलिस की कार्यप्रणाली के जाने-माने विशेषज्ञ डेविड एच बाल्येय का कहना है, 'आज के भारत में आपराधिक न्याय की दोहरी व्यवस्था पनप चुकी है। पहली, कानून की और दूसरी राजनीति की। कानून के पालन के बारे में पुलिस अधिकारियों द्वारा लिए जाने वाले निर्णय अक्सर पक्षपातपूर्ण और निर्वाचित प्रतिनिधियों के निर्देशों पर निर्भर होते हैं। इस संदर्भ में पुलिस अधिकारियों की स्वायत्तता नाममात्र की ही होती है।

कानून व व्यवस्था के मामले में लगभग पूरे देश के पुलिस अधिकारी आम तौर पर कोई कार्रवाई यह देख-सोचकर ही करते हैं कि इसकी राजनीतिक परिणति क्या होगी। ऐसे में कानून केशासन पर राजनीति के शासन को तरजीह दी जाती है और लोकतंत्र के नाम पर की जाने वाली निगरानी की वजह से आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता का क्षरण होता है।'

वीवीआईपी सुरक्षा व्यवस्था और दूसरे बंदोबस्त की वजह से कई बार अनेक आपराधिक मामलों में पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच मजाक बनकर रह जाती है। कभी-कभार इसकी वजह कालातीत हो चुकी कानून व प्रक्रिया भी होती है। आपराधिक जांच और अपराधी का पता लगाने के अपने मूल काम में पुलिस की रुचि लगातार घटती जा रही है।

कानून-व्यवस्था संबंधी ड्यूटी के बढ़ते दबाव के कारण भी यह नौबत आई है। ऐसी ड्यूटी में अतिरिक्त भत्ते तो मिलते ही हैं, सत्ता में बैठे लोगों के आसपास मंडराने के अवसर कहीं ज्यादा होते हैं। जांच-पड़ताल का काम अपेक्षाकृत ऊबाऊ और थका देने वाला होता है। इसमें ज्यादा समय लगने के कारण गवाहों के मुकर जाने और रुचि नहीं लेने की भी काफी संभावना रहती है।

यह भी देखने में आया है कि जांच-पड़ताल के प्रशिक्षण के लिए आम तौर पर उन ऊंचे अधिकारियों को विदेश भेजा जाता है जो अमूमन वास्तविक जांच प्रक्रिया में शामिल नहीं होते हैं। वास्तविक जांच करने वाले सब इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर या डीएसपी स्तर के अधिकारियों को ऐसे प्रशिक्षण के लिए विदेश जाने का मौका नहीं मिलता।

पुलिस के कामकाज में सुधार के लिए आठ राष्ट्रीय पुलिस आयोगों द्वारा दी गई रिपोर्टो और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को सरकारों ने बला ए ताक रख रखा है। इसकी वजह यह है कि ये सुधार लागू कर दिए गए तो पुलिस व राजनेताओं का गठजोड़ टूट जाएगा और फिर राजनेता न तो जांच प्रक्रिया में दखल दे सकेंगे और न ही उसका पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल ही कर सकेंगे।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात आपराधिक न्याय के मामलों को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने में पुलिस की बढ़ती नाकामी है। प्रियदर्शिनी मट्टू के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की यह टिप्पणी गौरतलब है कि पुलिस के जूनियर अधिकारी अपनी बिरादरी के रिश्तेदारों के खिलाफ होने वाली शिकायतों पर कार्रवाई करने में रुचि नहीं लेते हैं।

इस संदर्भ में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की इस टिप्पणी का भी उल्लेख किया है कि दिल्ली पुलिस के निचले स्टाफ के कामकाज के तरीके से ऐसा लगता है कि कानून का शासन उसे लागू करने वालों और उनके परिजनों पर लागू नहीं होता है। संचार के आधुनिक साधनों और तेज रफ्तार वाहनों की संख्या में वृद्धि के साथ अपराधों का दायरा भी बढ़ा है।

अपराधियों के लिए जिलों-राज्यों की सीमाओं का कोई अर्थ नहीं होता और वे पूरे देश में अपनी गतिविधियों का विस्तार करने के मौके तलाशते रहते हैं। सीआरपीसी और आईपीसी बनने के बाद से अपराधों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आ चुका है। आम लोगों की तरह अपराधियों की भी तमाम आधुनिक साधनों तक पहुंच बन गई है। पहले जिन अपराधों के बारे में कभी सुना-सोचा तक नहीं जाता था वे आज आम हो चले हैं।

हर कोई जल्दी से जल्दी धन कमाने की होड़ में लगा हुआ है। एक राज्य में अपराध करके दूसरे राज्य में सभ्य नागरिक के तौर पर रहने वालों का एक नया वर्ग पनप रहा है। इस वर्ग ने पूंजी बाजार से लेकर रियल स्टेट तक में निवेश कर रखा है। बहुत से मामलों में पुलिस के पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने की वजह से जांच-पड़ताल ठीक से नहीं होती। आम धारणा है कि कानून का पालन करने में पुलिस मनमानी करती है, अमीरों की मदद करती है और गरीब विरोधी रवैया अपनाती है।

कभी-कभी तो समाज में सम्मानजनक स्थान रखने वाले लोगों के साथ भी वह तमीज से पेश नहीं आती। लोग पुलिस से दूरी बनाए रखने में ही अपना भला समझते हैं। पुलिस अधिकारी खुद को कानूनों से ऊपर मानते हैं। इन हालात को सुधारने के लिए पुलिस और उसके राजनीतिक आकाओं को फौरी तौर पर सुधारात्मक कदम उठाने होंगे अन्यथा हालात बद से बदतर होते जाएंगे।

-लेखक सीबीआई के निदेशक रहे हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: