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संकट में हौसला नहीं खोते बच्चे

रायपुर.boys वर्ष 2007 के लिए राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने वालों में पांच छत्तीसगढ़ से हैं, जिनमें राजनांद गांव (छत्तीसगढ़) के युक्तार्थ श्रीवास्तव सबसे छोटे हैं। छह साल के युक्तार्थ को संजय चोपड़ा एवार्ड मिलेगा। ३0 दिसंबर 2006 को युक्तार्थ ११ महीने की अपनी छोटी बहन सुरमयी के साथ घर के बाहर खेल रहा था। खेलते-खेलते सुरमयी आगे निकल गई और उसे कुत्तों के एक झुंड ने घेर लिया।

यह देख पहले युक्तार्थ ने चिल्लाकर अपने परिजनों से मदद मांगी, जब किसी ने आवाज नहीं सुनी तो खुद ही कुत्तों के बीच कूद पड़ा और अपनी बहन को गोद में लेकर कुत्तों को भगाने का प्रयास करने लगा। करीब आधा दर्जन कुत्ते युक्तार्थ पर झपट पड़े और उसके पांव व जांघ में काटकर उसे घायल कर दिया। उसने हौसला नहीं खोया और बहन को गोदी में संभाले रखा और धीरे-धीरे घर की ओर भागा।

इस अदम्य साहस का परिचय देने वाले युक्तार्थ को क्रिकेट बिल्कुल नापसंद है। टीवी पर जेटिक्स चैनल देखना और बॉस्केटबाल खेलना उसे पसंद है। बड़े होकर वह डॉक्टर बनना चाहता है। महासमुंद जिले के बोईरगांव के मानस निषाद (६ साल ९ महीने) ने तालाब में लुढ़ककर जा गिरे तीन साल के बच्चे की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह किए बगैर छलांग लगा दी। घोर संघर्ष के बाद मानस छोटे बच्चे सहित खुद को सुरक्षित बाहर निकालने में कामयाब हो गया। वह भी डॉक्टर बनना चाहता है।

सरगुजा जिले के कटकोना गांव के दो भाईयों रवि कुमार झारिया (१क् साल २ महीने) व अवधेश कुमार झारिया (११ साल ३ महीने) को विषम परिस्थितियों में अपनी उम्र से कहीं अधिक की बुद्धिमत्ता का परिचय देने के लिए पुरस्कार के लिए चुना गया है। दोनों भाई परिवार के सदस्यों के साथ ३0 दिसंबर 2006 को एक यात्रा पर निकले। रास्ते में एक अनियंत्रित ट्रक ने उनकी गाड़ी को आगे से टक्कर मार दी।

इस हादसे में इनके पिता, जीजा व नन्हें भांजे ने मौके पर ही दम दौड़ दिया। मां व बहन की हालत गंभीर थी। दोनों भाईयों ने आते-जाते वाहनों को रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन कोई मदद नहीं मिली। तब रवि दूर से चमकती रोशनी की ओर दौड़ कर गया। करीब डेढ़ किलोमीटर दूर पॉवर प्लांट के लोग उसकी मदद को तैयार हो गए।

इस दौरान अवधेश घायलों पर पानी छिड़कता रहा और एक ट्रक रोकने में कामयाब हो गया, जिसकी मदद से घायलों को अस्पताल पहुंचाया जा सका और उनकी जान बच सकी। रवि बड़ा होकर सैनिक और अवधेश बड़ा होकर इंजीनियर बनना चाहता है। दंतेवाड़ा जिले के रविंद्र हलधर ने ३-४ अगस्त, 2006 को सुकमा नगर में बाढ़ से घिरे छह परिवार के २२ सदस्यों को अपनी छोटी सी नाव से निकाल लिया।

पानी के तेज बहाव में करीब 500 मीटर अंदर फंसे लोगों को बचाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा रहा था, तब रविंद्र ने यह जोखिम उठाया और धैर्य व साहस के साथ कामयाबी हासिल की। उसकी मां की मानसिक हालत ठीक नहीं है, इसलिए पांच साल पहले पांचवी पास करने के बाद ही पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी। अब जीवकोपार्जन के लिए उसके पास नाव भी नहीं है। वह चाहता है कि सरकार उसे कोई छोटी-मोटी नौकरी दे दे।





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