अभिमत. अंतत: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी बर्ड फ्लू की गंभीरता को स्वीकार कर ही लिया। लेकिन जो नुकसान होना था वह हो चुका है। उनकी लेटलतीफ स्वीकारोक्ति यह भी बताती है कि इस रोग की रोकथाम के इंतजामों में अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गई।
वह भी तब जब पिछले साल बांग्लादेश में बर्ड फ्लू के विषाणु पाए जाने के बाद बांग्लादेश की सीमा से लगे राज्य के कारण इसकी सख्त दरकार थी। पानी जब सिर के ऊपर से निकल गया तब कहीं जाकर राज्य सरकार ने बांग्लादेश से मुर्गियों के आयात पर प्रतिबंध लागू किया।
भारत में बर्ड फ्लू ने दोबारा दस्तक दी है। इसके पहले महाराष्ट्र में मामला सामना आने पर केंद्र व राज्य सरकार ने मुस्तैदी दिखाते हुए न सिर्फ स्थिति को अतिशीघ्र काबू में किया था, बल्कि बचाव के लिए जागरूकता अभियान भी चलाया था। ऐसे में जब विश्व स्वास्थ्य संगठन बर्ड फ्लू के विषाणुओं के फैलने की चेतावनी जारी कर चुका था, तब पश्चिम बंगाल सरकार की लापरवाही प्रशासन में गंभीर खामी की ओर ही इशारा करती है।
स्थिति यहां तक बिगड़ चुकी है कि बर्ड फ्लू के विषाणु दो और नए जिलों में अपने पैर पसार चुके हैं। हालांकि राज्य सरकार ने दस दिनों के भीतर सीमित संसाधनों का रोना रोते हुए मुर्गियों को मार देने का काम पूरा कर लेने का आश्वासन दिया है, लेकिन जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई संभव नहीं है।
गरीब मुर्गी पालक जहां मुआवजे की राशि को लेकर आत्महत्या करने पर उतारू हो गए हैं। वहीं कतर सरीखे देश ने भारतीय पोल्ट्री उत्पाद पर प्रतिबंध लागू कर दिया है। भूटान और नेपाल पहले ही इसके संकेत दे चुके हैं। इसका सबसे दूरगामी प्रभाव भारत से खाद्य पदार्थो के होने वाले निर्यात पर पड़ेगा।
अर्थव्यवस्था के ऐसे सुनहरे दौर में जब खाद्य पदार्थो के निर्यात से विदेशी मुद्रा का अच्छी संभावना बन रही हो तब ऐसे मामले सामने आना अच्छा नहीं कहा जा सकता है।