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दृष्टिकोण. गुजरात चुनाव के तीन सबक हैं। पहला, नायकनुमा खलनायकों के खिलाफ प्रति-नायक खड़े करने होंगे। दूसरा, वर्तमान व्यवस्था के भीतर कुछ बेहतरी के लालच से मुक्त करने के लिए पूंजीवाद विरोधी चेतना बनानी होगी। तीसरा, सेकुलरवाद की घिसी-पिटी भाष को आम जनता की भाष में पुन: गढ़ना होगा।
जब से गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणाम घोषित हुए हैं तब से हम सबकी मेज पर एक लिफाफा पड़ा है। हम सब, यानी वे सब जो एक लोकतांत्रिक, समतामूलक और विविधता-संपन्न भारत का सपना देखते हैं, चिट्ठी बिना खोले हम जानते हैं कि प्रेषक का नाम है नरेन्द्र भाई मोदी।
हम यह भी जानते हैं कि चिट्ठी का मजमून अप्रिय है। इसलिए हम उस लिफाफे को न खोलने के बहाने खोज रहे हैं। चुनावी हार-जीत तो आनी-जानी चीज है। फिर मन यह कहता है लिफाफे में चिट्ठी है तो सही, लेकिन पढ़ने लायक नहीं है। दूसरों के खून से लिखी इस इबारत में नफरत और हिंसा के सिवाय पढ़ने को है क्या? या फिर हमारा मन एक अंतिम बहाना ढूंढ़ लाता है- यह चिट्ठी मेरे नाम नहीं है। मामला सिर्फ गुजरात का है।
न जाने क्यों पिछले छह साल से गुजरात नफरत की राजनीति की गिरफ्त में है। चाहे वह शेयर बाजार के खिलाड़ी की मनोवृत्ति हो या फिर गांधी का नाम ढोने से उपजी थकावट या फिर कमजोर समझे जाने की छवि से पनपी कुंठा, मामला गुजरात नामक एक अपवाद तक सीमित है। बहाने दिलासा तो दे सकते हैं, लेकिन ताकत नहीं देते।
देर-सबेर हमें गुजरात के जनादेश का कड़वा सच कबूल करना ही होगा। हमें गुजरात से आया लिफाफा खोलना ही पड़ेगा और इस चिट्ठी से सबक लेना ही होगा, क्योंकि यह मामला आज के गुजरात का नहीं, हमारे सपनों के भारत का है। चूंकि गुजरात से आई इस चिट्ठी में समतामूलक वैकल्पिक राजनीति के लिए कुछ दूरगामी सबक हैं।
पहला सबक लोकतंत्र में नेतृत्व की अपेक्षा के बारे में है। चुनाव नतीजे आने के बाद से हर कोई मोदी के जादू की बात कर रहा है। सवाल यह है कि यह जादू है किस बात का? यह सिर्फ लच्छेदार भाष में दिए गए भड़काऊ भाषणों का जादू नहीं है। हकीकत यह है कि अपने राज में मोदी ने एक औसत गुजराती के मन में एक ऐसी छवि बनाई जिसका मुकाबला करना नामुमकिन था।
यह छवि एक ऐसे नेता की थी जो दिन-रात प्रदेश के विकास और जनता की भलाई के लिए समर्पित है, जो अपने पास दरबारियों को फटकने नहीं देता, जो न रिश्वत खाता है ना खाने देता है। इस छवि का एक दूसरा अंश भी था - एक ऐसा नेता जो सख्त फैसले लेने से गुरेज नहीं करता, जो नियम कानून के दाव-पेंच में फंसे बिना अपने निर्णयों पर अमल करना जानता है।
इस संदर्भ में असली सवाल यह नहीं है कि यह छवि किस हद तक सच है। बेशक यह छवि अर्धसत्य, मोदी के प्रचार तंत्र की तिकड़म और मीडिया की मिलीभगत से बनी है। असली सवाल यह है कि एक औसत नागरिक इस प्रचार का शिकार क्यों होता है और आखिर इसकी काट क्या हो सकती है? इस सवाल के उत्तर पाना और उन्हें पचाना आसान नहीं है।
छवि तंत्र के इस युग में जनता लोकतांत्रिक नेताओं में एक नायक या नायिका ढूंढ़ती है। जनता नेताओं में ईमानदारी और कार्यकुशलता के साथ-साथ मजबूती भी चाहती है और मजबूत नेताओं के अलोकतांत्रिक पहलू को नजरअंदाज करने को तैयार रहती है। ऐसे नेताओं की काट सिर्फ इनकी आलोचना और पर्दाफाश करके नहीं बल्कि एक वैकल्पिक नेतृत्व खड़ा करके ही हो सकती है।
गुजरात से आई इस चिट्ठी का दूसरा संदेश अर्थनीति के बारे में है। भाजपा का प्रचारतंत्र मोदी की जीत को गुजरात के विकास और सुशासन की जीत की तरह पेश करना चाहता है। शायद इसी की प्रतिक्रिया में मोदी विरोधियों ने यह कहना शुरू कर दिया कि आर्थिक विकास के दावे खोखले थे, कि अगर विकास हुआ भी तो उससे आम आदमी को कुछ नहीं मिला। इसमें कोई शक नहीं कि प्रदेश के दस फीसदी से अधिक की दर से हुए विकास के बंटवारे में घोर विषमता थी।
लेकिन सुदूर गांव के गरीब व्यक्ति को भी बिजली, पानी और सड़क में सुधार महसूस होता था। सरकारों से कुछ भी हासिल होने की उम्मीद छोड़ चुके आम नागरिक के लिए यह छोटी उपलब्धि नहीं थी। मोदी ने इस उपलब्धि पर अपनी व्यक्तिगत मुहर लगाई और चुनाव में इसका फायदा उठाया। इस लिहाज से मोदी की सरकार पूंजीवादी राजनीति का एक नया चेहरा पेश करती है।
इस मॉडल में सरकार खुले तौर पर उद्योगपतियों और पूंजीपति वर्ग के 'ईमानदार' दलाल की भूमिका अदा करती है, उसके सहारे आर्थिक विकास की दर बढ़ाती है और उसका फायदा मुख्यत: उसी वर्ग और शहरी मध्यम वर्ग को होता है। समाज में विषमता बढ़ती है, लेकिन साथ ही आर्थिक संपन्नता का थोड़ा सा फायदा किसान और मजदूर तक भी पहुंचता है और इतने भर से उनका राजनीतिक समर्थन हासिल कर लिया जाता है।
इस चिट्ठी का तीसरा और सबसे पीड़ादायक सबक धर्मनिरपेक्षता की राजनीति के बारे में है। हकीकत यह है कि मोदी ने यह जनादेश सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे नहीं जीता। भाजपा उन इलाकों में भी जीती जहां सांप्रदायिक तनाव तक नहीं था। मोदी ने गुजराती राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता का एक मुहावरा तैयार किया है। यह मुहावरा एक औसत गुजराती के स्वाभिमान को छूता है।
राजनीति की इस नई भाष के सामने भारतीय राष्ट्रवाद और सेकुलरवाद की परंपरागत राजनीति गूंगी साबित हुई है। आम जनता न तो जन्मजात सांप्रदायिक होती है, न ही सेकुलर। उसे सांप्रदायिक या सेकुलर बनाने की प्रक्रिया वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष के रास्ते से गुजरती है। यह संघर्ष हर पीढ़ी को नए सिरे से करना पड़ता है। गुजरात से आई चिट्ठी हमें याद दिलाती है कि सेकुलरवाद की स्थापित भाष घिस गई है और हमें आम जनता से काटती है। अगर सेकुलरवाद को जिंदा रखना है तो इसे आम लोगों की भाष और मुहावरे में नए सिरे से गढ़ना होगा।
यह तीनों सबक सीखना आसान नहीं होगा। इसके लिए निर्ममता से अपनी स्थापित मान्यताओं को सच की कसौटी पर कसना होगा। दुनिया को बदलने का आह्वान करने से पहले खुद अपने आप को बदलने का संकल्प लेना होगा। अगर इस संकल्प के साथ गुजरात से आए लिफाफे को खोलेंगे तो हो सकता है एक सुखद आश्चर्य हमारा इंतजार कर रहा हो। संभव है कि लिफाफे पर हमारे नाम की जगह 'इक्कीसवीं सदी के सत्याग्रही के लिए' लिखा हो। हो सकता है प्रेषक 'मो. क. गांधी' हों।
-लेखक सीएसडीएस में सीनियर फेलो हैं।