|
संपादकीय. भारत-अमेरिका परमाणु संधि देश के भीतर तो गंभीर मतभेद का कारण बनी ही हुई है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे लेकर एक राय नहीं होने से इसके अमल की दिशा में आगे बढ़ना यूपीए सरकार के लिए और भी मुश्किल होता नजर आ रहा है।
इस संदर्भ में 45 देशों के न्यूक्लीयर सप्लायर ग्रुप के प्रमुख सदस्य आस्ट्रेलिया का रवैया भारत के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक है। आस्ट्रेलिया ने पहले तो अंतरराष्ट्रीय संधियों के मानकों के तहत भारत को उसकी जरूरत के मुताबिक यूरेनियम की सप्लाई करने के लिए हामी भरी थी, मगर सत्ता परिवर्तन के बाद वहां बनी नई सरकार ने अब परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने की शर्त पर ही भारत को यूरेनियम देने की बात कही है।
आस्ट्रेलिया का यह रवैया हमें इसलिए चिंता में डालने वाला है कि प्रचुर यूरेनियम भंडारों वाले इस देश से परमाणु ईंधन नहीं मिलने पर हमें उसकी आपूर्ति के लिए ऐसे देशों की ओर मुखातिब होना पड़ सकता है जहां इसके भंडार सीमित हैं और जो इसे महंगे दामों में ही सप्लाई करेंगे और ज्यादा कड़ी शर्ते भी रखेंगे। चूंकि अमेरिका के साथ आस्ट्रेलिया की नई सरकार के संबंध वहां की पिछली सरकार की तरह मधुर नहीं हैं, इसलिए हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अमेरिका के दबाव में अपनी नीति में किसी तरह का बदलाव लाएगा।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय मामलों में अमेरिका के पीछे चलने वाले इंगलैंड ने भारत के साथ परमाणु सहयोग करने का इरादा जताया है और भारत यात्रा पर आ रहे उसके प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन इस बाबत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चर्चा भी करने वाले हैं मगर वह भी आईएईए और न्यूक्लीयर सप्लायर ग्रुप के नियमों के दायरे से बाहर जाने को तैयार नहीं है और हमें ब्रिटेन से भी कोई उल्लेखनीय मदद मिलने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
मनमोहन सिंह की हाल की चीन यात्रा से भी कोई सकारात्मक बात निकलकर नहीं आई है। उधर, अमेरिका में चुनावी साल होने के कारण परमाणु संधि पर अमल बुश प्रशासन की प्राथमिकताओं में बहुत नीचे जा चुका है। जार्ज डब्लू बुश इस संधि को अमली जामा पहनाए जाने के लिए अपने स्तर पर कोई अतिरिक्त पहल करने से रहे।
लुब्बेलुबाब यह कि तमाम कारणों से महत्वाकांक्षी परमाणु संधि की स्थिति त्रिशंकु की तरह होती जा रही है और यह वास्तविक धरातल पर शायद ही कभी आकार ले सके। ऐसे में हमें अपने परमाणु कार्यक्रम को किसी दूसरे देश पर निर्भर बनाने की बजाय पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की सलाह पर विचार करना होगा और देश में ही थोरियर्म इधन आधारित परमाणु रिएक्टर बनाने की प्रौद्योगिकी विकसित करने को शीर्ष प्राथमकिता देनी होगी।