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इंदौर. बोरिंग पर किए जा रहे खर्च से तीन गुना आमदनी का अनुमान है लेकिन साथ में यह सवाल भी है कि चालीस फीसदी वैध कनेक्शनों से वसूली में असफल रहा निगम प्रशासन नई व्यवस्था कैसे लागू करगा?
निगम के मुताबिक शहर में तीन हजार सार्वजनिक बोरिंग में से करीब दो हजार से एक लाख घरों पर कनेक्शन किए गए हैं। उनसे नर्मदा कनेक्शन की तरह जलकर वसूली होने पर निगम को 19 करोड़ रुपए सालाना मिलेंगे।
इन पर निगम सालभर में 6 करोड़ रुपए खर्च करता है जिसमें 3.60 करोड़ की बिजली, 2 करोड़ का मेंटेनेंस और 60 लाख के अन्य खर्च शामिल हैं।
कैसे लागू होगी नई व्यवस्था
बकौल महापौर वसूली जबरदस्ती कनेक्शन लेने वालों से होगी लेकिन ऐसे बाहुबलियों से निगम का अमला कैसे वसूली करगा और जबरिया कनेक्शन कैसे पहचाने जाएंगे?
फरवरी से जून तक 70 फीसदी बोरिंग सूख जाते हैं। उनसे संबद्ध इलाकों में पांच महीने की वसूली होगी या नहीं? ..और पानी का इंतजाम कैसे होगा?
गर्मी में हर दिन सौ बोरिंग खराब होने की शिकायत मिलती है जिन्हें सुधारने में औसत तीन दिन लगते हैं। उन दिनों की भरपाई कैसे होगी।
बोरिंग पर वॉल्व सिस्टम कारगर नहीं। ऐसे में समान वितरण कैसे होगा।
वर्तमान (अ)व्यवस्था
1.8 लाख से ज्यादा नर्मदा नल कनेक्शन में से 70 हजार से ज्यादा नियमित भुगतान नहीं करते।
40 हजार से ज्यादा कनेक्शन अवैध। नगर निगम ने सघन सर्वे कर 2005-06 में 2,729 और 2006-07 से 2007-08 में 10 हजार कनेक्शन वैध किए।
अव्यवस्थित वितरण प्रणाली के चलते 50 एमएलडी नर्मदा जल बेकार बह जाता है यानी सालभर में 18,250 मीलियन लीटर। इसे सहेजें तो तीन महीनें तक 180 एमएलडी पानी मिल सकता है।