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भोपाल.प्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। लंबे इंतजार के बाद चुनावी वर्ष में भाजपा सरकार की मंत्रिपरिषद उपसमिति ने आयुक्त प्रणाली को हरी झंडी दे दी है। अब राज्य सरकार इसे केंद्र को भेजकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में है।
इधर प्रशासनिक सेवा के अफसरों ने इस मसले पर रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार के प्रस्तावित पुलिस एक्ट के लिए बनी मंत्रिपरिषद की उपसमिति ने पिछले सप्ताह अपनी रिपोर्ट सौैंपी है। समिति ने पुलिस आयुक्त प्रणाली को लेकर यह सिफारिश की है कि राज्य सरकार चाहे तो इसे लागू कर सकती है।
इस समिति में गृहमंत्री हिम्मत कोठारी, आवास एवं पर्यावरण मंत्री जयंत मलैया, नगरीय प्रशासन विकास मंत्री नरोत्तम मिश्रा और नर्मदा घाटी विकास मंत्री नागेंद्र सिंह शामिल थे।
पाले में डालने के लिए :
जानकारी के अनुसार राज्य सरकार कैबिनेट की मंजूरी के बाद इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पाले में डालने पर विचार कर रही है, ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में वह आईपीएस लाबी की सहानुभूति प्राप्त कर सके।
आईएएस अफसर जल्द बैठक करेंगे:
पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने की अनुशंसा से आईएएस जहां चिंतित नजर आ रहे हैं, वहीं आईपीएस अधिकारियों के चेहरे खिल गए हैं। आईएएस अधिकारी इस मुद्दे पर चर्चा के लिए जल्द ही एक बैठक करने जा रहे हैं, लेकिन एसोसिएशन अभी चुप्पी साधे हुए है।
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी अभी कुछ कहने से बच रहे हैं। हालांकि जानकारी के अनुसार प्रशासनिक अधिकारी इस बात की कोशिश में हैं कि किसी तरह एक बार फिर इस मुहिम की हवा निकाली जाए।
कब क्या हुआ-
यूं बार-बार बाहर आया जिन्न
पुलिस कमिश्नर प्रणाली का जिन्न बाहर आने की यह हैट्रिक कही जा सकती है। सबसे पहले सन 1984 में अजरुनसिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में गठित मंत्रिपरिषद की उपसमिति ने भी यह प्रणाली लागू करने की अनुशंसा की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने राज्य के इस प्रस्ताव पर आदिवासी बाहुल्य प्रदेश होने की आड़ लेकर सहमति नहीं दी थी।
इसके बाद जब दिग्विजयसिंह मुख्यमंत्री थे, तब तत्कालीन डीजीपी सुभाषचंद्र त्रिपाठी ने वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी राजेंद्र चतुर्वेदी से एक पुलिस एक्ट तैयार कराया था। इसमें पांच लाख से अधिक की आबादी वाले शहरों में ही पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने की वकालत की गई थी।
इसे लेकर दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक बाजीगरी के अंदाज में मामला अनेक बार उछाला और हर बार उसे विराम भी दिया। आलम यह हुआ कि प्रणाली की बात भोपाल-इंदौर तक ही सिमट कर रह गई थी। नया कानून और पुलिस कमिनश्नर प्रणाली लागू करने के बारे में कई दौर की चर्चाएं हुइर्ं, लेकिन इस पर अमल नहीं हो पाया।