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अभिमत. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन द्वारा आतंकवाद से निपटने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के सुझाव दिए जाने से ज्यादा महत्वपूर्ण उनकी यह स्वीकारोक्ति है कि विफल देशों में आतंकवाद पनपने की संभावनाएं चिंता का विषय हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली भारत यात्रा पर आए ब्राउन ने भले ही किसी देश का नाम न लिया हो, पर पश्चिमी देशों द्वारा पिछले कई मौकों पर पाकिस्तान पर आतंकवाद को शह देने का आरोप लगाया जाता रहा है।
पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का वहां की आंतरिक परिस्थितियों पर नियंत्रण कमजोर हुआ है। एक सशक्त केंद्रीय शासन न होने की वजह से पाकिस्तान के दूरदराज इलाकों में कट्टरवादी गुटों का वर्चस्व बढ़ा है जो अनेक आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते रहे हैं। यह तब है जब वह 9/11 हादसे के बाद से अमेरिका द्वारा वैव्श्रिक आतंकवाद के खिलाफ छेड़े गए युद्ध में बराबर का साझेदार बना हुआ है।
आतंकवाद से निपटने के लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बनाने का ब्राउन का प्रस्ताव भारत द्वारा दिए गए पिछले कई सुझावों से अलग नहीं है। भारत ने अलग-अलग मौकों पर कई बार यह सुझाव दिया है कि आतंकवाद को केवल क्षेत्रीय समस्या के रूप में न देखा जाए। इसके बावजूद पश्चिमी देश भारत के सुझाव के अनुपालन में गंभीरता का प्रदर्शन नहीं करते। वे ऐसी बातें तभी करते हैं जब स्वयं उन पर आतंकवाद का कहर टूटता है।
ऐसे में अब समय आ गया है कि आतंकवाद से निपटने के लिए बनाई गई रणनीति में कमजोर देशों को स्थिरता प्रदान कर वहां आंतरिक शांति बनाए रखने पर भी जोर दिया जाए। इस परिदृश्य में भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।