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दृष्टिकोण. अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश की मति मारी गई है, क्या? इराक और अफगानिस्तान के दलदल में से वे अभी तक निकल नहीं पाए हैं और अब वे ईरान की खाई में कूदने को तैयार हैं। अपनी हुकूमत के आखिरी साल में उन्हें क्या सूझी कि वे पश्चिम एशिया के दौरे पर निकल पड़े। पिछले हफ्ते उन्होंने कुवैत, अबूधाबी, सऊदी अरब, मिस्र और बहरीन का दौरा किया। इस दौरे में उन्हें लोकतंत्र का दौरा पड़ गया। लगभग हर देश में उन्होंने लोकतंत्र का उपदेश झाड़ा।
उन्हें पता है कि जिन देशों में वे घूम रहे थे वहां अपने-अपने ढंग की शासन व्यवस्था है। उन्हें अमेरिकी लोकतंत्र रास नहीं आता। वे अमेरिका की नकल क्यों करें? फिर भी बुश लोकतंत्र का राग अलापते रहे। यह राग इतना बेसुरा था कि किसी भी मेजबान देश ने अपने मेहमान के सुर में सुर नहीं मिलाया। मिस्र के अलावा सभी देशों में राजशाही है। वहां न कोई सार्वभौम संसद है, न नियमित चुनाव हैं, न सुनिश्चित मानव अधिकार हैं और न ही नर-नारी समता है। मिस्र में भी 27 साल से हुस्नी मुबारक का एकछत्र राज चल रहा है।
मजा यह है कि ये ही राष्ट्र अमेरिका के खासमखास हैं। क्यों हैं यह बुश नहीं बताएंगे। अगर ये सब राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी हैं तो अमेरिका उनसे इतने अधिक घनिष्ठ संबंध क्यों गांठे हुए है और अगर इनकी घनिष्ठता इतनी जरूरी है तो फिर इन पर लोकतंत्र के उपदेश झाड़ने की क्या जरूरत है। दूसरे शब्दों में बुश ने पश्चिम एशिया की इस कूटनीतिक यात्रा को मजाक यात्रा में बदल दिया है। अगर उन्हें किसी मुस्लिम लोकतांत्रिक देशों में ही जाना था तो उन देशों में जाते जो लोकतंत्र की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जैसे फलस्तीन, ईरान, इराक, पाकिस्तान, लेबनान, मलेशिया आदि।
सचाई तो यह है कि बुश के लिए लोकतंत्र तो एक बहाना भर है। अमेरिका ने दुनिया में जितने तानाशाहों की परवरिश की, दुनिया के अन्य किसी राष्ट्र ने नहीं की है। ऐसे में बुश की पश्चिम एशिया की यात्रा का उद्देश्य बहुत ही संकीर्ण था। उनका एकमात्र लक्ष्य ईरान विरोधी माहौल खड़ा करना था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उन्होंने जो आड़ ली, वह भी क्या आड़ है? लोकतंत्र की आड़ गिर गई तो उन्होंने इजरायल-फलस्तीन विवाद की चिलमन पकड़ ली। पूरे एक हफ्ते वे इसी चिलमन से लगे बैठे रहे।
भला बुश से कोई पूछे कि अमेरिका फलस्तीन विवाद को हल कैसे करवा सकता है? विवाद की असली जड़ तो वह खुद ही है। यदि अमेरिका खुद को मंच से हटा लेता तो क्या यह विवाद 60 साल तक खिंच सकता था? इजरायल जैसा छोटा देश दो दर्जन अरब राष्ट्रों की छाती पर पांव रखकर कब तक खड़ा रह सकता था?
फलस्तीन के लोकप्रिय सत्तारूढ़ दल हमास की सरकार को अमेरिका ने अभी तक मान्यता नहीं दी है। वह उसे आतंकवादियों का गिरोह कहता है और इजरायल भी उससे बात करने को तैयार नहीं है। सिर्फ फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास, जो नाममात्र के नेता हैं, कैसे फलस्तीन को सार्वभौम राष्ट्र बना सकते हैं। उनके द्वारा किए गए समझौते या दिए गए आश्वासनों को लागू कौन करेगा। अगर फलस्तीनियों से जरा भी सहानुभूति बुश के दिल में होती तो वे फलस्तीन जाते।
वे सिर्फ इजरायल क्यों गए? क्या कोई निष्पक्ष मध्यस्थ इस तरह की गंभीर भूल भी करता है? बुश ने इजरायल में तीन दिन बिताए लेकिन उनका शांति का रथ तीन इंच भी आगे नहीं बढ़ा। हमास के नेता इस्माइल हनीएह ने ठीक ही कहा कि बुश ने इजरायल जाकर यह बता दिया कि वे दरअसल किसके साथ हैं। सचाई तो यह है कि बुश ने फलस्तीन के मुद्दे को भी ईरान के खिलाफ इस्तेमाल किया। उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री एहुद ओल्मर्ट से ईरान के खिलाफ जबर्दस्त जहर उगलवाया।
ओल्मर्ट ईरान को खुलेआम धमकी देने से भी बाज नहीं आए। जैसे 1981 में इजरायल ने इराक के ओसीराक परमाणु संयंत्र पर हमला बोल दिया था, वैसे ही वह ईरान के परमाणु ठिकानों को ध्वस्त कर सकता है, ऐसी धमकियां बुश की इजरायल यात्रा से निकलती रही। इजरायलियों ने बुश के येरुशलम रहते हुए ही उस रपट को भी रद्द कर दिया, जिसमें गुप्तचर विभाग ने साफ-साफ कहा था कि ईरान ने 2003 से ही अपना फौजी परमाणु कार्यक्रम रोक दिया है।
बुश की इस पश्चिम एशिया यात्रा ने ईरान के अतिवादियों के हाथ मजबूत किए हैं। जैसे अफगानिस्तान के संदर्भ में मैं अक्सर कहता हूं कि बुश और ओसामा बिन लादेन जुड़वां भाई हैं। ईरान के संदर्भ में मुझे कहना पड़ रहा है कि बुश अहमदीनेजाद के बड़े भाई हैं। बुश ने महमूद अहमदीनेजाद को हीरो बना दिया है। बुश का अतिवाद ही अहमदीनेजाद की लोकप्रियता का मूल आधार है। अगर बुश अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं होते तो 2005 में अहमदीनेजाद ईरान के राष्ट्रपति का चुनाव शायद ही जीत पाते।
अब भी मार्च में होने वाले ईरानी चुनावों में अगर अहमदीनेजाद जीतेंगे तो उसका श्रेय बुश को ही होगा। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे राष्ट्रों ने बुश को साफ-साफ कह दिया है कि वे ईरान के साथ अच्छे पड़ौसी के संबंध बनाकर रखना चाहते हैं और उन्हें ईरान से कोई खतरा नहीं है। (अगर इजरायल को कोई खतरा है तो वह अपनी जाने)। वास्तव में अमेरिका को भी ईरान से कोई खतरा नहीं है। इजरायल के खतरे को अपना खतरा मानकर अमेरिका सारा गणित बैठा रहा है।
उसने सऊदी अरब को 20 बिलियन डॉलर के ताजातरीन हथियार बेचने की पेशकश की है। इतना ही नहीं, वह अपनी मूर्खता के कारण इन अरब राष्ट्रों के हाथ किसी और ढंग से भी मजबूत कर रहा है। बुश की यात्रा के एक हफ्ते पहले अमेरिका ने होरमुज के मुहाने पर अमेरिकी और ईरानी जल सेनाओं में भिड़ंत की ऐसी अफवाह फैलाई कि तेल के दाम आसमान छूने लगे। अकेले ईरान की सालाना आमदनी में 20 बिलियन डॉलर का इजाफा हो गया है।पता नहीं क्यों बुश प्रशासन ईरान के प्रति आत्मघाती नीति अपनाए हुए है। शिया ईरान पर हमला बोलकर अमेरिका इराक के उन शिया लोगों को भी अपने विरुद्ध कर लेगा, जो सद्दाम विरोधी हैं। यदि अमेरिका इराक में सफल होना चाहता है तो क्या उसे ईरान से शांतिवार्ता नहीं चलानी चाहिए? ईरान के साथ तनाव घट जाए तो अमेरिका को उसका सीधा फायदा अफगानिस्तान और पाकिस्तान में भी मिलेगा।
लेबनान तथा अन्य अरब देशों में बसे लाखों शिया लोगों को दुश्मन बनाकर अमेरिका सुन्नी जगत से अपनी दोस्ती नहीं बढ़ा सकता। एक ताजा सर्वेक्षण से भी पता चला है कि सुन्नी राष्ट्रों के 80 प्रतिशत लोग ईरान को नहीं इजरायल को खतरा मानते हैं। 'फूट डालो और राज करो' की यह बुश की नीति पश्चिम एशिया में फुस्स हो गई है।