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संपादकीय. भारतीय सेना में अधिकारियों की कमी के प्रति रक्षा मंत्री व सैन्य प्रमुख की चिंता सार्वजनिक होने से यह तथ्य उभरकर आता है कि आज की पीढ़ी के लिए सेना की नौकरी आकर्षण खो रही है। सेना में यह स्थिति अचानक उत्पन्न हुई हो, ऐसा नहीं है।
पिछले लगभग दो दशक से स्कूल-कॉलेजों में अनिवार्य रूप से जारी एनसीसी का प्रशिक्षण दुर्लभ होता जा रहा है। यह वही दौर है जब देश में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई व लगातार उसे बढ़ावा मिलता रहा। स्कूलों में एनसीसी लागू होने से विद्यार्थी जीवन से ही सेना के प्रति अभिरुचि व सम्मान की भावना जाग्रत होती थी, जो आगे चलकर कैरियर के रूप में सैन्य सेवाओं के रूप में युवाओं को बेहतर विकल्प लगता था।
इसे दुर्लभ किए जाने से सेना के प्रति विद्यार्थी जीवन में आकर्षण कम हुआ और युवाओं की अभिरुचि सैन्य सेवाओं के प्रति घटती गई। दूसरी ओर आर्थिक उदारीकरण के चलते ग्लैमरस व मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों का मानो सैलाब सा आ गया। ऐसी नौकरियां सम्मान और प्रतिष्ठा का सबब बनने लगीं। युवाओं की सोच में सामाजिकता के बदले व्यक्तिवादी केंद्रीयता हावी होती गई।
अर्थव्यवस्था और सामाजिक क्षेत्र में हो रहे इस बदलाव के सैन्य सेवाओं में पड़ने वाले प्रभाव को लगातार नजरअंदाज ही किया गया और स्थिति यह बन गई कि आज सैन्य प्रमुख को सेना में अधिकारियों की कमी को सार्वजनिक करना पड़ रहा है।
यह विसंगति ही है कि सामाजिक हिंसा और दंगों जैसी स्थिति ने नागरिक जीवन में सेना की भूमिका को लगातार बढ़ाया है और शांति व्यवस्था कायम करने में सेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वहीं दूसरी ओर सैन्य सेवाओं को एक बेहतर कैरियर के रूप में अपनाने का आकर्षण घटा है।
राजनीति और चुनाव के परिप्रेक्ष्य में यह तथ्य निरंतर रेखांकित होता रहा है कि आधी आबादी युवाओं की है लेकिन इन युवाओं में सेना को आजीविका के रूप में ग्रहण करने का वातावरण क्षीण होता रहा है।
सैन्य प्रमुख के सैन्य शिक्षा के सुझाव को इसी रूप में लिया जाना चाहिए कि स्कूल-कॉलेजों में एनसीसी फिर प्राथमिकता के साथ लागू की जाए। इसके साथ यह भी जरूरी है कि सेना एक बेहतर नियोक्ता के रूप में इस प्रतिस्पर्धा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे जहां से युवा पीढ़ी अपने कैरियर के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करती है।