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साइंस प्रैक्टिकल ‘देखकर’ कोर्स पूरा

जयपुर. महाराजा कॉलेज में साइंस की पढ़ाई मजाक बनकर रह गई है। थ्योरी की कक्षाएं पूरी नहीं लगने के कारण चिंतित छात्रों को अब प्रैक्टिकल की ंिचंता भी सताने लगी है। एक-एक बैच में 20 की जगह 60 से 80 छात्रों को प्रैक्टिकल कराया जा रहा है, ताकि मार्च में होने वाली परीक्षाओं से पहले कोर्स किसी तरह पूरा हो जाए। ऐसे में छात्र प्रैक्टिकल करने के बजाय दूसरे छात्रों को करते देखकर कोर्स पूरा कर रहे हैं।

कॉलेज प्रशासन इसके लिए शिक्षकों की कमी का रोना रो रहा है। भास्कर संवाददाता सोमवार को कॉलेज की रसायनशास्त्र प्रयोगशाला में पहुंची। वहां एक सीट पर तीन से चार छात्रों को प्रैक्टिकल करते पाया। उनके मार्गदर्शन के लिए तीन शिक्षक वहां मौजूद थे, लेकिन वे सभी को अच्छी तरह से समझा नहीं पा रहे थे। डॉ. सीपीएस चंदेल ने कहा कि इस लैब में करीब 158 छात्रों को प्रैक्टिकल कराया जाता है।

शिक्षक नहीं होने से दो-दो सेक्शन के छात्रों का एक साथ प्रैक्टिकल होता है। प्रो. एलएन यादव के अनुसार साइंस में एक शिक्षक पर करीब 60 से 80 छात्रों को प्रैक्टिकल कराने की जिम्मेदारी है, जबकि नियमानुसार 20 छात्र होने चाहिए।

संसाधनों का इस्तेमाल करने वाले नहीं

कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. आरसी चौधरी के मुताबिक प्रैक्टिकल कक्षाएं खाली नहीं हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी से काम अच्छी तरह नहीं हो रहा। टैक्निकल स्टाफ भी पचास फीसदी कम है। करीब इतने ही कालांश खाली गए। लैब में सभी सुविधाएं हैं, लेकिन उनका उपयोग करने वाले नहीं हैं। इसमें कॉलेज क्या कर सकता है ? दिल्ली, पंजाब जैसे दूसरे राज्यों के साइंस के छात्र राजस्थान से बेहतर हैं।

अच्छी आर्थिक स्थिति वाले अभिवावक तो अपने लड़कों को निजी कॉलेजों में डाल देते हैं, लेकिन गांवों से आने वाले छात्र परेशानी भुगतते हैं। शिक्षकों की कमी के चलते अभी तक मैथ्स और जूलोजी के प्रैक्टिकल नहीं हुए। प्रिंसिपल ने बताया अतिरिक्त कक्षाएं लेकर उसे पंद्रह दिन में पूरा कर लिया जाएगा।

बायोटेक का प्रैक्टिकल नहीं, फीस ली 4000 रुपए

बीएससी प्रथम वर्ष के छात्रों ने बताया बॉटनी की बायोटैक की कक्षाएं दस फीसदी हरुई तथा प्रैक्टिकल नहीं हुए, जबकि इसकी फीस 4000 रुपए है। जूलोजी के प्रैक्टिकल के तो दो-तिहाई कालांश नहीं हुए। अब पढ़ाई क्या खाक करेंगे। इसी वर्ष के पास कोर्स (जे सेक्शन) के छात्रों के अनुसार कैमिस्ट्री के तीनों पेपर के एक भी कालांश नहीं लगे।

मैथ्स के प्रैक्टिकल भी नहीं हुए। बीएससी द्वितीय वर्ष (मैथ्स) के छात्रों का कहना था एक कालांश के बाद बीच में दो से तीन कालांश खाली रहते हैं, नतीजा कई छात्र चले जाते हैं। साइंस का बेस कमजोर होने से किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में पार कैसे पाएंगे ?





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