लगभग दो दशक पहले देश के मीडिया में एक वनस्पति घोटाला खूब चर्चित हुआ था। तब जैन वनस्पति नाम की एक कंपनी हाइड्रोजेनेटेड वनस्पति वसा बनाती थी जिसे स्वास्थ्य अथवा बचत की दृष्टि से घी या मक्खन का विकल्प बताया गया था। लेकिन बाद में खुलासा हुआ कि कंपनी ऐसा अपने फायदे के लिए कर रही थी और अपने उत्पाद में वनस्पति तेलों की जगह गाय की चर्बी का इस्तेमाल कर रही थी।
चूंकि यह जरूरी नहीं है कि सभी वनस्पतियां शाकाहारी हों इसलिए वनस्पति के नाम पर मांसाहारी उत्पादों की बिक्री भी धड़ल्ले से की जाती रही है। दरअसल, उद्योग-व्यापार में जो कुछ नैतिक प्रतीत होता है उसका वास्तव में नैतिक होना जरूरी नहीं है। आखिर उद्योग-व्यापार का मूल उद्देश्य तो लाभ कमाना ही है। इस संदर्भ में हाल ही में धर्म सूचकांक को लेकर आने वाली खबरें पसोपेश से भरी हुई हैं।
बताया जाता है कि धर्म सूचकांक के तहत उन्हीं कंपनियों में निवेश किया जाता है जो हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों की मान्यताओं को ठेस नहीं पहुंचातीं या उनकी भावनाओं को आहत नहीं करती हैं। इसके मायने यह हैं कि इन चारों धर्मो की अवधारणाएं एक जैसी हैं और जो निवेशक धर्म सूचकांक में निवेश करते हैं उनकी कंपनियां उनके धर्मो की मान्यताओं को ध्यान में रखकर काम करती हैं।
ऐसे में एक धारणा यह भी बनती है कि ये कंपनियां अपने कारोबार में नैतिक होती हैं। यह अलग बात है कि इस सबमें एक तरह की पाखंडपूर्ण भलमनसाहत झलकती है। यहां यह रोचक है कि धर्म सूचकांक के संदर्भ में उपरोक्त चारों धर्मो की धार्मिक मान्यताओं को एक जैसा या समान मान लिया गया है। सिद्धांत और दर्शन की दृष्टि से ऐसा किया जाना सरासर नासमझी है।
वास्तव में उपरोक्त चारों धर्म एक जैसे नहीं हैं। उनमें कुछ बातें जरूर समान हैं मगर भिन्नताएं भी कम नहीं हैं। दरअसल, हिंदुत्व एक बहुत व्यापक धर्म है जबकि अन्य तीन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उनका दायरा अपेक्षाकृतसंकुचित है। थोड़ी देर के लिए हम मान लेते हैं कि धर्म सूचकांक में शामिल कंपनियों के कुछ उद्देश्य समान हो सकते हैं। आम धारणा है कि उपरोक्त चारों धर्मो में अहिंसा को लगभग एक जैसा महत्व दिया जाता है लेकिन इस धारणा की अलग-अलग व्याख्या भी की जा सकती है।
सिख धर्म अपने जांबाज लड़ाकों को आदर और सम्मान के भाव से देखता है-खासकर गुरु गोविंद सिंह के बलिदान के बाद से। बौद्ध आम तौर पर शाकाहारी नहीं होते। क्षत्रिय हिंदुओं के लिए युद्ध को एक कर्तव्य के रूप में देखा गया है और गीता में भगवान कृष्ण ने अजरुन को यही उपदेश दिया है। इन चारों धर्मो में केवल जैन धर्म में किसी भी तरह की हिंसा का निषेध किया गया है। ऐसे में कौन धर्म तय करेगा कि हथियार निर्माता कंपनियों में किया जाने वाला निवेश धर्म सूचकांक के दायरे में आता है या नहीं।
यही स्थिति शाकाहार को लेकर है। हिंदुओं, सिखों और बौद्धों के लिए शाकाहारी होना जरूरी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि धर्म सूचकांक के तहत क्या ऐसी कंपनियों में निवेश नहीं किया जाएगा जो गैर-शाकाहारी उत्पादों की फ्रीजिंग या पैकेजिंग करती हैं। साथ ही क्या धर्म सूचकांक बड़ी संख्या में रिटेल स्टोर चलाने वाली ऐसी कंपनियों से भी नाता नहीं रखेगा जिनके स्टोरों में गैर-शाकाहारी उत्पाद भी रखे व बेचे जाते हैं।
ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि आखिरकार वे कौन-सी कंपनियां हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन धर्मो की मान्यताओं के आधार पर निवेश के लिए उपयुक्त हों। क्या इन चारों धर्मो में ऐसी कोई समानताएं हैं जिन्हें सफल उद्योग-व्यापार में बदला जा सकता है? और धन कमाने के लिए उस पर 'पवित्रता' का लेबल चस्पा करने की जरूरत ही क्या है? क्या धन कमाना अपने आप में पर्याप्त नहीं है?
अंत में सवाल उठता है कि क्या धर्म सूचकांक का गोरखधंधा विभिन्न धर्मो की अवधारणाओं और मान्यताओं के बारे में भारी गलतफहमी पर तो नहीं टिका है। समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कुछ मूर्खतापूर्ण परंपराओं का पालन करते हैं और फिर इस बात पर जोर देते हैं कि उनके ऐसा करने को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह उनकी आस्था, संस्कृति या परंपरा से जुड़ा मामला है।
विधवाओं को बनारस में छोड़ देना, पति की चिता पर जलकर जान दे देना, महिलाओं का खतना करना आदि आस्था, संस्कृति या परंपरा से जुड़ी बातें हैं पर इस आधार पर इन्हें सही तो नहीं ही ठहराया जा सकता है। हमारा देश राजनीति और धर्म के नापाक गठबंधन के भयंकर दुष्परिणामों से पहले से ही अच्छी तरह वाकिफ है। धर्म और धन से जोड़े जाने का विचार तो और भी घातक साबित हो सकता है।
विभिन्न धर्मो के बारे में जानकारी के अभाव के तथ्य को कुछ देर के लिए बला ए ताक रख दें तो भी धर्म सूचकांक का गोरखधंधा समझ से परे है। 'अच्छे' या 'सही' तरीके से धन कमाने का प्रलोभन वस्तुत: हमारी भावनाओं के साथ नई तरह का खिलवाड़ है। जैन वनस्पति की तरह लाभ कमाने के उद्देश्य को लेकर ईमानदार होना अपने आप में काफी है। इस पर नैतिकता का चोला ओढ़ाना सरासर पाखंड है। ऐसे पाखंडों के दिन अब लद चुके हैं।