अभिमत. सदियों से चली आ रही वर्ण आधारित समाज व्यवस्था में जातिगत भेदभाव तो समझ में आता है, लेकिन धर्म के आधार पर हमारे देश में भेदभाव के उदाहरण नहीं के बराबर ही हैं। आजादी के बाद सिर्फ सरकारी नौकरी ही नहीं, बल्कि राजनीति, खेल, रक्षा, व्यापार, फिल्मों आदि के क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय के अनेक नाम ख्याति के शिखर पर रहे।
इसे देखते हुए धर्मगत भेदभाव या कम अवसरों की बात आसानी से गले नहीं उतरती है। आज भी ऐसे असंख्य उदाहरण हैं, जहां विभिन्न धर्मो के लोग परस्पर मिल-जुलकर एक-दूसरे के त्योहार मनाते हैं। ऐसे माहौल में धर्मगत आरक्षण देने से लोगों के बीच वैमनस्य और भेदभाव की खाई बढ़ेगी ही।
संभवत: यही वजह है कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में भी धर्मगत आरक्षण पर एकराय कायम नहीं हो पा रही है। इससे पता चलता है कि यह कोई सार्वभौमिक मांग नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ प्रेरित मांग है। जहां कुछ पार्टियों का इस मांग का विरोध उनकी नीतियों से प्रभावित है, वहीं कुछ अन्य पार्टियों के नेताओं में भी इस मुद्दे पर मतभेद दिखता है।
इसका ताजा प्रमाण केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल द्वारा अल्पसंख्यकों को आरक्षण की वकालत तो मानव संसाधन मंत्री अजरुन सिंह द्वारा विरोध किया जाना है। सबसे अचरज वाली बात तो यह है कि जिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण मांगा जा रहा है, उसने इस तरह की कोई सिफारिश की ही नहीं है। यह बात स्वयं समिति के अध्यक्ष जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने कही।
आज की खुली बाजारीकृत अर्थव्यवस्था में सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध हैं। इसे देखते हुए धर्म या जातिगत आरक्षण से बेहतर होगा कि सुविधाओं को बढ़ाया जाए। इससे ही सभी समान रूप से लाभ प्राप्त कर सकेंगे और समतामूलक समाज की स्थापना हो सकेगी। यही भेदभाव रूपी सामाजिक समस्या का एक तार्किक और सर्वमान्य हल भी होगा।