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जमीन मालिकों को 20 प्रतिशत विकसित प्लॉट दें

इंदौर. हाईकोर्ट की इंदौर बैंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए विकास प्राधिकरणों से कहा है वे जबरिया भू-अधिग्रहण से बचें और विकास में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करें। आदेश में कहा गया है यदि विकास प्राधिकरण आवासीय योजनाओं के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहित करें तो उसके ऐवज में उन्हें उनके विकल्प पर 20 प्रतिशत विकसित प्लाट) दें। कोर्ट ने कहा इस समय जब अन्य राज्यों के किसान औद्योगीकरण और सेज के कारण पीड़ा भोग रहे हैं और उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है, ऐसे में मध्यप्रदेश सरकार की आवास नीति सही दिशा बताती है।

स्कीम-136 और 140 के लिए जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बैंच के जस्टिस विनय मित्तल ने कहा जमीन अधिग्रहण के लिए शासन ने एक प्रक्रिया तय की है, उसका पालन होना चाहिए। स्कीम-136 के खिलाफ महावीर गृह निर्माण सहकारी संस्था मर्यादित और स्कीम-140 के खिलाफ त्रिशला गृह निर्माण सोसायटी हमीद खां, इकबाल खां व हुर्राबाई ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

इसमें कहा गया था इंदौर विकास प्राधिकरण इन स्कीमों के लिए जमीनें अधिग्रहित कर रहा है और इसके बदले मुआवजा देना चाहता है। याचिकाकर्ताओं का कहना था हमें आवास नीति के अनुसार 20 प्रतिशत विकसित प्लॉट मिलना चाहिए। उनका यह भी कहना था यदि आईडीए हमें 20 प्रतिशत विकसित प्लॉट देगा तो हम और कोई क्लेम नहीं पेश करेंगे। इन सभी भू-धारकों ने अवॉर्ड हो जाने के बावजूद अब तक मुआवजा नहीं लिया था।

याचिका पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस मित्तल ने मप्र सरकार की आवास नीति का हवाला देते हुए कहा इसकी कंडिका 6.6 की मूल भावना यह है कि विकास संस्थाओं को किसानों की निजी जमीन सुलभता से उपलब्ध हो और किसानों को जमीन उपयोग के परिवर्तन से होने वाले आर्थिक लाभ का उचित हिस्सा मिले। इससे अधिग्रहण संबंधी लंबी प्रक्रिया से भी बचा जा सकेगा।

अन्य प्रदेशों के हालातों पर चिंता जताई- हाईकोर्ट ने देश के अन्य प्रदेशों में हो रहे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए जबरिया जमीन अधिग्रहण पर चिंता जताई। पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम का नाम लिए बगैर हाईकोर्ट ने कहा इसी का परिणाम है किसानों को अपनी बहुमूल्य जमीन बचाने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है।

न्यायालय ने ऐसी जमीन अधिग्रहण मुहिम को अनुचित बताया जिससे भूधारकों के सामने जीवन-मरण का सवाल उठ खड़ा हो और आजीविका का संकट उत्पन्न हो जाए। हाईकोर्ट ने कहा रोजी-रोटी के संकट के चलते किसान संघर्ष को मजबूर हो जाते हैं। फैसले में जबरिया भू अधिग्रहण के मामले में सेज का उदाहरण खासतौर से दिया गया है। फैसले में कहा गया है औद्योगिकीकरण और सेज के लिए जो जमीन लगती है, उसके लिए गहन चिंतन किया जाना चाहिए।

स्कीम-136 को 1995 के बाद की स्कीम माना

प्राधिकरण पक्ष ने स्कीम-136 को 1995 से पहले की स्कीम होने का दावा किया था और इस आधार पर कहा गया था आवास नीति 1995 में लागू की गई। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और स्कीम-136 को 1995 के बाद की योजना माना। हाईकोर्ट ने कहा ग्राम निवेश अधिनियम की धारा 73 के अंतर्गत राज्य शासन विकास प्राधिकरणों को निर्देश दे सकता है और प्राधिकरण उसे मानने के लिए बाध्य हैं।

आवास नीति का लाभ अवॉर्ड के बाद भी मिल सकता है

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कलेक्टर द्वारा मुआवजा निर्धारित करने और अवॉर्ड होने के बाद भी भूधारकों को आवास नीति का फायदा मिल सकता है।

स्कीम-140 के लिए 136 का फैसला बरकरार रखा

स्कीम-136 पर कोर्ट ने 7 दिसंबर को फैसला सुनाया था। ऐसी ही याचिका स्कीम-140 के विरुद्ध दायर की गई थी। कोर्ट ने 22 जनवरी को स्कीम-140 पर फैसला देते हुए उसी फैसले को बरकरार रखा है जो स्कीम-136 के लिए दिया गया था।





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