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68 प्रतिशत अंकों पर टॉपर!

जयपुर. वर्ष 2004 में प्री-पीजी टॉपर के ९२ प्रतिशत अंक थे। राज्य सरकार ने १९९८ में प्री-पीजी परीक्षा में इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए ५क् प्रतिशत का कोटा तय किया था। इसका उद्देश्य था कि गांवों में कार्यरत डॉक्टर भी उच्च शिक्षा का फायदा उठाएं, जिससे गांवों में बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा सके। लेकिन, वर्ष २क्क्६ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस कोटे को घटाकर २५ प्रतिशत कर दिया गया।

बाकी के २५ प्रतिशत को ऑल इंडिया प्री-पीजी से भरने का नियम लागू कर दिया गया। राज. स्वास्थ्य विज्ञान विवि. स्थापित होने के बाद पिछले दो वर्र्षो से इन-सर्विस डॉक्टरों का कोटा नहीं भरा जा सका है। प्री-पीजी परीक्षा में ५५ इन-सर्विस विद्यार्थियों का कोटा होने के बावजूद पिछले वर्ष जनरल के ५ और एसटी के एक अभ्यर्थी का चयन हुआ था। इस वर्ष जनरल के ६, एसटी के ३ और एससी के ३ विद्यार्थियों का चयन हुआ है।

क्यों नहीं भरा जा रहा है कोटा

ज्वाइंट एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स के अध्यक्ष डॉक्टर संजय शर्मा ने बताया कि 1996 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि प्री-पीजी परीक्षा में फ्रेशर छात्रों और इन-सर्विस डॉक्टरों के लिए अलग-अलग पेपर होने चाहिए। विवि. इस मामले में नियमों की अवहेलना करते हुए लगातार दोनों के लिए एक ही पेपर दे रहा है।

इस बार प्री-पीजी परीक्षा में शामिल हुए डॉ. सुरेन्द्र परिहार ने बताया ‘इस मामले को लेकर जब हम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी पी एस माथुर से मिले तो उन्होंने हमें झिड़कते हुए कहा कि पिछले दो वर्र्षो से तो पांच-सात स्टूडेंट सलेक्ट हो रहे हो, अगले वर्ष तो एक भी स्टूडेंट के सलेक्ट होने की स्थिति नहीं बन पाएगी।

सिंडीकेट में सदस्यता नहीं दी

डॉक्टर संजय शर्मा ने बताया कि ऐसे मामलों को रोकने के लिए विश्वविद्यालय की सिंडीकेट में छात्रों का प्रतिनिधित्व जरूरी है। यह प्रस्ताव स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने ठुकरा दिया, जबकि राजस्थान विवि जब प्री-पीजी परीक्षाएं आयोजित करता था, उन दिनों सिंडीकेट में छात्रों का प्रतिनिधित्व होता था।





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