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क्लास में मोबाइल का क्या काम?

अभिमत. अत्याधुनिक तकनीक अगर एक ओर समाज के लिए वरदान है तो दूसरी ओर किन्हीं-किन्हीं मामलों में अभिशाप भी। इसका प्रमाण दिल्ली के एक स्कूल में कुछ वर्ष पहले सामने आया एमएमएस प्रकरण था, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस प्रकरण ने सामाजिक-नैतिक बहस के अलावा स्कूली बच्चों के लिए मोबाइल की अनिवार्यता पर भी बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा किया था। इसी के बाद जब कुछ और ऐसे मामले सामने आए तो दिल्ली सरकार ने सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में मोबाइल प्रतिबंधित कर दिया था।

इसके बाद कई अन्य राज्यों ने भी स्कूल-कॉलेज में छात्रों और शिक्षकों के मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध लगाया। इनमें मध्यप्रदेश, पंजाब, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि सम्मिलित हैं। हालिया कड़ी में हिमाचलप्रदेश सरकार ने भी स्कूल-कॉलेजों के पठन-पाठन वाले माहौल में छात्रों और शिक्षकों के लिए कक्षाओं में मोबाइल प्रतिबंधित कर दिया है। इसके साथ ही छात्रों के लिए मोबाइल की जरूरत पर नए सिरे से बहस चल सकती है।

अगर जरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान का तर्क दिया जाता है तो उसके लिए प्रत्येक स्कूल-कॉलेज में पिं्रसिपल रूम होता है, जिसका इस्तेमाल आपातकाल में हो सकता है। वैसे भी विद्यार्थियों के बीच मोबाइल जरूरत से कहीं ज्यादा स्टेटस सिंबल के तौर पर इस्तेमाल होता है। अभिभावक भी बच्चों की जिद मानकर उन्हें मोबाइल उपलब्ध करा देते हैं।

नतीजतन एमएमएस प्रकरण, किसी की मर्जी के विरुद्ध उसे कैमरे में कैद करना और उस पर विवाद, अश्लील एसएमएस जैसे मामले बढ़ते हैं। यही नहीं इसकी मदद से छात्र अपनी अलग दुनिया बसा लेते हैं, जहां किसी भी बड़े का कोई हस्तक्षेप नहीं रहता। सरकारी प्रतिबंध के साथ-साथ इस बारे में अभिभावकों का भी दायित्व बनता है कि वे भी अपने बच्चों की आवश्यकता को प्राथमिकता दें न कि जिद को।





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