जयपुर. लगता है ‘अतुल्य भारत’ की उपमा के जरिये विदेशी पावणों को रिझाने की नीति राजस्थान की रंगीली धरती को रास नहीं आ रही, क्योंकि यहां तो पर्यटकों को आए दिन लूटपाट, अभद्र व्यवहार और बदहाल सुविधाओं से दो-चार होना पड़ता है। पर्यटक पुलिस असहाय है, तो पर्यटकों के लिए भारी खर्च में छपाई गई सूचनाएं (लिटरेचर) नदारद हैं।
स्थानीय पर्यटक केन्द्रों पर रखे रजिस्टरों में पर्यटकों की टिप्पणियों से उजागर होती इस सच्चई पर विभाग कितना गौर करता है, यह तो पता नहीं, लेकिन ‘राष्ट्रीय पर्यटक दिवस’ (25 जनवरी) के उपलक्ष्य पर भास्कर की पड़ताल में सामने आई खामियां..
कैसा पर्यटन दिवस?
इसके बारे में अधिकतर अधिकारियों को तो जानकारी तक नहीं थी, बल्कि उन्होंने 26 जनवरी के कार्यक्रमों का ब्यौरा देना शुरू कर दिया। जब उनसे पर्यटन दिवस की जानकारी चाही गई, तो उनका टका-सा जवाब था, ‘विभाग की ओर से कुछ भी नहीं किया जा रहा।’
टूर ऑपरेटर संजय कौशिक कहते हैं कि, जिन पर्यटकों से राज्य को मोटी विदेशी आय मिलती है, उनके प्रति विभाग कतई संवेदनशील नहीं है। आम दिनों की छोड़ दें, तो पर्यटन दिवस जैसे मौकों पर भी ऐसा ही नजरिया रहा तो जल्द ही इसके बुरे नतीजे सामने होंगे।
आखिर कहां है ढाई करोड़ का लिटरेचर?
पर्यटकों की सुविधा के लिए छपने वाले सूचनात्मक साहित्य पर सालाना 2 से 2.50 करोड़ का बजट खर्च किया जाता है, लेकिन पर्यटन केन्द्रों तक यह पहुंच नहीं पाता। लोकल टूरिस्ट ऑफिस आमेर, रेलवे स्टेशन पर टूरिस्ट अफसरों ने गिने-चुने नक्शों के अलावा कोई साहित्य नहीं मिलने की बात कही।
भारत सरकार टूरिस्ट गाइड एसोसिएशन के अध्यक्ष टी.एस. सोलंकी के अनुसार पर्यटन कार्यालयों में लिटरेचर नहीं मिलने से ही पर्यटकों को लपकों की ओर रुख करना पड़ता है। आखिर इतने बजट का लिटरेचर कहां जाता है, इसकी पड़ताल होनी चाहिए।
बिना सुविधा और पावर की कैसी पुलिस ?
पर्यटक पुलिस के जवान राजेन्द्र सिंह, अजरुन सिंह और नंदलाल ने बताया कि सभी आला अफसर और मीडिया पर्यटक पुलिस से सिर्फ अपेक्षा ही रखते हैं, लेकिन उनके सामने आने वाली परेशानियों पर कभी गौर नहीं किया जाता। ना टैफ (पर्यटक सहायता बल) को लपकों पर कार्रवाई करने के अधिकार हैं और ना ही उन्हें पकड़ने में सहायक गाड़ी और वायरलैस की व्यवस्था।
यहां तक कि केवल ढाई से चार हजार रुपए की मासिक पगार भी तीन-तीन महीने बाद मिल पाती है। हकीकत बयां करने पर आला अधिकारियों से भला-बुरा सुनने को और मिलता है।
आलीशान महल, पर आम सुविधाएं बदहाल
आमेर टूरिस्ट ऑफिस में रखे पर्यटक व्यू रजिस्टर में एक फ्रेंच पर्यटक लिखते हैं कि आमेर महल की ख्याति जगजाहिर है और खासकर यह सुनकर ही हमने यहां आने का मानस बनाया, लेकिन यहां आते ही हम चौंक पड़े कि यहां आम सुविधाओं का बहुत बुरा हाल है। पर्यटक पुलिस को इसके बारे में बताया तो वो भी असहाय नजर आई।