अभिमत. अंतत: 42 वर्षो बाद भारतीय हिंदी फिल्में पाकिस्तान में प्रदर्शित हो सकेंगी। इस बाबत पाकिस्तान की संसद ने भारतीय फिल्मों पर लगा प्रतिबंध हटा लेने का निर्णय किया है। उसने यह कदम पाकिस्तान के मरते फिल्म उद्योग में जान डालने के लिए उठाया है।
यह अलग बात है कि इसका फायदा हमारी फिल्मों और उनके निर्माताओं को भी मिलेगा, अन्यथा इसके पहले पाइरेटेड हिंदी फिल्में पाकिस्तान के बाजार में धड़ल्ले से बिक रही थीं। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद हिंदी फिल्मों पर यह प्रतिबंध चस्पा किया गया था।
पाकिस्तान के सिनेमा उद्योग के दुर्दिन इससे समझे जा सकते हैं कि 1970 में वहां 1300 सिनेमा हॉल थे, वहीं आज इनकी संख्या महज 275 के आसपास ही रह गई है। जब-जब भारतीय फिल्मों पर लगे प्रतिबंध को हटाने की बात उठी, पाकिस्तान के एक तबके ने उसे खारिज कर दिया।
सांस्कृतिक प्रभाव के वर्चस्व के अलावा उनका मानना था कि भारतीय फिल्मोद्योग के आगे पाकिस्तान का छोटा फिल्म उद्योग टिक नहीं पाएगा। हालांकि अब यही कारण भारतीय फिल्मों से प्रतिबंध हटाने का आधार बना है।
माना जा रहा है कि भारत-पाकिस्तान के संयुक्त प्रयासों से फिल्म निर्माण होने से पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री को संजीवनी मिल जाएगी। साथ ही पाकिस्तानी फिल्मों को उत्तर भारत के रूप में भी एक नया बाजार मिल सकता है। फिर भारत के लिहाज से देखें तो पाकिस्तान में हिंदी के अलावा पंजाबी और सिंधी सिनेमा के दरवाजे भी खुल जाएंगे।
सबसे बड़ी बात पाइरेसी से राहत मिलेगी। फिर, दोनों देशों के बीच संबंध सुधार के क्रम में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा। आखिर पाकिस्तान में अमिताभ बच्चन, माधुरी दीक्षित, शाहरुख खान और रानी मुखर्जी की लोकप्रियता किसी भी भारतीय प्रतीक की तुलना में कहीं ज्यादा है।