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सरकोजी के साथ सहयोग का हाथ

संपादकीय. फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की आज से शुरू हो रही भारत यात्रा में दोनों देशों के परंपरागत द्विपक्षीय संबंधों में नए आयाम जुड़ सकते हैं बशर्ते दोनों ही पक्ष अपने-अपने कतिपय पूर्वाग्रहों को छोड़कर खुले मन से संभावनाओं के नए आकाश तलाशने की कवायद करें। सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में फ्रांस अकेला ऐसा देश है जिसकी नीतियां आम तौर पर परिषद के दूसरे देशों की मुखापेक्षी नहीं होती हैं और परंपरा से जिसका झुकाव समाजवाद की ओर रहा है।

हालांकि व्यापार-व्यवसाय के मामले में अपने दीर्घकालिक नफे-नुकसन का ध्यान रखने में फ्रांस दूसरे देशों से कमतर नहीं है। यही कारण है कि जब भारत ने अपनी सेना के लिए करीब एक बिलियन डॉलर की लागत से हल्के हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए चल रही बातचीत के अंतिम दौर में सौदे से हाथ खींच लिए, तो उसने अपनी नाराजगी और खिन्नता जाहिर करने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई।

फ्रांस की दलील थी कि उसकी यूरोकॉप्टर कंपनी दुनिया की अकेली ऐसी कंपनी है जिसके हेलिकॉप्टर सियाचिन क्षेत्र में उड़ान भरने के योग्य हैं और भारत के इस सौदे से पीछे हटने पर द्विपक्षीय संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इन संबंधों की संवेदनशीलता के मद्देनजर ही भारत ने दो बिलियन यूरो की लागत से फ्रांस के साथ मिराज विमान खरीदने और उन्हें अपग्रेड करने का समझौता करने की तैयारी जताई है जिसकी घोषणा सरकोजी की यात्रा के दौरान किए जाने की संभावना है।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान परमाणु सहयोग समझौते की शेष औपचारिकताएं भी पूरी की जा सकती हैं। हालांकि इस बाबत होने वाला कोई भी समझौता तभी प्रभावी होगा जबकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी भारत के संदर्भ में विशेष सुरक्षा उपायों को अंितम रूप दे दे और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह भारत को विशेष दर्जा देने की औपचारिकताएं पूरी कर दे। 1998 में भारत द्वारा पोकरण में दूसरा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद जब दूसरी परमाणु शक्तियां भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश का दर्जा नहीं दिए जाने की तोता-रटंत लगाए थीं, तब केवल फ्रांस ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देशों की बिरादरी में विशेष दर्जा देने की वकालत की थी।

गनीमत है कि सरकोजी के साथ उनकी प्रेमिका और पूर्व सुपर मॉडल कार्ला ब्रूनी भारत नहीं आ रही हैं अन्यथा उनके लिए प्रोटोकॉल तय करने में भारत सरकार को तो पसोपेश होता ही, सांस्कृतिक मूल्यों के स्वयंभू पहरेदारों को भी बवाल खड़ा करने का मौका मिलता। उम्मीद की जानी चाहिए कि लगभग 10 साल के अंतराल के बाद हो रही किसी फ्रांसीसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान दोनों देश एक-दूसरे के और करीब आएंगे और सहयोग का नया दौर शुरू होगा।





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