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Republic Day 2008 Republic Day 2008
देश को आजाद हुए छह दशक बीत चुके हैं तो गणतंत्र बने 58 साल। स्वतंत्रता के बाद नेहरू के जमाने में देश को एक व्यवस्थित दिशा देने के लिए विशेष सैद्धांतिक और आधारभूत कदम उठाए गए। नेहरू काल में देश के विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके से शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, उद्योग क्षेत्र में विकास की योजनाएं बनाई र्गइ।
उसके बाद 90 के दशक में देश की आर्थिक नीतियों को उदार किया गया और उसका असर आज हम देख भी रहे हैं। बहुत तेजी से हर पहलू में विकास भी हो रहा है। लेकिन देश की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करना और साक्षरता का लक्ष्य पाना यह मेरी पीढ़ी द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सका। हम जो नहीं कर पाए, उसका नुकसान आज हमारे लोकतंत्र को हो रहा है।
हमने छह दशक में अपनी आबादी 30 करोड़ से बढ़ाकर एक अरब से ऊपर कर ली है। बढ़ती आबादी और उससे जुड़ी अर्थनीति की त्रुटियां हमें दिख ही रही हैं। पहले जिंदगी सरल थी, क्योंकि तब स्पेस थी। लेकिन अब तनाव बढ़ रहा है, हम एक-दूसरे से लड़-लड़कर मर जाएंगे। हर तरफ आबादी, सब तनाव में, मैं भी-तुम भी और वो भी ।
इसका कारण यह है कि हमने ग्रामीण भारत के विकास की ओर गंभीरता से और प्राथमिकता से ध्यान ही नहीं दिया। मैं आज के आर्थिक नीति-निर्माताओं से कहता भी हूं- तुम सभी सेंसेक्स लोग बन चुके हो। अब तुम लोग संवेदनशील नहीं रहे हो। ऐसे में तुम गांधी के लोग कैसे हो सकते हो? ठीक है देश की तरक्की भी हुई है, लेकिन ग्रामीण भारत की बात बनी नहीं। आप कहते हैं कि आप वल्र्ड पावर बन रहे हैं। लेकिन मैं मानता हूं ऐसा नहीं है।
जब तक हम अपने देश की 70 फीसदी आबादी को पीछे रखेंगे, तब तक हम कहीं नहीं जा सकेंगे।यह ठीक है कि नेहरू और उसके बाद 1991 में आर्थिक सुधार के कारण देश का काफी फायदा हुआ। आज देश में अपार संभावनाएं और क्षमता है। देश के पास पैसा भी है और देश में पैसा बढ़ भी रहा है। हम इससे प्रसन्न हो जाते हैं कि दुनिया में अमीरों की सूची में भारतीय बढ़ते जा रहे हैं।
लेकिन गौरव की बात तो तब होनी चाहिए जब हम समता आधारित समाज बना पाएं। देश में उद्यमशीलता और प्रबंधन क्षमता बहुत अधिक है। देश की असल समृद्धि तो उसकी उद्यमशील क्षमता ही है, लेकिन हमारा गवर्नेस सिस्टम उसके साथ कदम मिलाकर नहीं चल पा रहा है।विश्व स्तर पर भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पड़ोसी देशों के मुकाबले देखें तो हमारे देश की आर्थिक स्थिति भी मजबूत है।
बाहर से भी धन आ रहा है क्योंकि देश का लोकतंत्र, कानून का शासन, एक विश्वसनीय न्यायिक व्यवस्था हमारे लिए लाभकारी है। लेकिन आंतरिक रूप से देखें तो समग्र विकास की बातें भर की जाती हैं लेकिन उस पर वास्तविक रूप से अमल करने की जरूरत महसूस नहीं की जाती है। ऐसा नहीं है कि किसी भी समस्या का समाधान करने की किसी के पास जादू की छड़ी है लेकिन इसके लिए स्पष्ट लक्ष्य और सतत प्रयास किए जाने की जरूरत है।
जहां तक साक्षरता की बात है देश में यह 80 फीसदी होनी चाहिए थी। यह नहीं कि यह केवल केरल तक ही रह जाए। इतने साल में हम यह भी प्राप्त नहीं कर पाए। बिहार, यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा जैसे राज्यों में साक्षरता का इसमें ग्राफ काफी नीचे होने के कारण हम यह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।
सवाल यह है कि जब ईरान जैसे देश दो दशक में अपने यहां साक्षरता दर 25 फीसदी से 75 -80 फीसदी ला सकता है तो हम क्यों नहीं कर पाए। हैरानी होती है कि 60 साल में हम यह नहीं कर पाए। जो है भी वो आधी-अधूरी है, आंकड़े तो ऐसे ही होते हैं। देश में अगर 80 फीसदी साक्षरता होती तो देश की राजनीति भी कुछ और होती। आज से अलग होती और आज से बेहतर भी होती।
लोकतंत्र हमारी सबसे बड़ी ताकत है। हमने लोकतंत्र को पूरी तरह अपना लिया है, जिसके कारण हमारे यहां लचीलापन है। देश की अपनी एक सभ्यता है और 3000 साल का धर्म है। हम धार्मिक लोग हैं। जिसे हम कभी नहीं छोड़ सकते हैं। चुनावी राजनीति से इसे दूर रखना चाहिए, अन्यथा आने वाले समय में बेहद मुश्किल होगा।
हम केवल आर्थिक शक्ति से विश्व शक्ति नहीं बन सकते हैं। हम विश्व शक्ति तब बनेंगे, जब हम एक निष्पक्ष, न्यायोचित समाज के रूप में अपने आप को विश्व के सामने रखेंगे। लेकिन हम देख रहे हैं कि हमारी राजनीति में तीखापन आ रहा है, जबकि लोकतंत्र में धैर्य व सहनशीलता की व्यवस्था है।
इसलिए आज और भविष्य की जरूरत यही है कि हम एक सहनशील और सबको समायोजित करने वाला लचीला समाज बने रहें। सोसाइटी ऑफ धर्म (रिलीजन नहीं) होनी चाहिए। जो हरेक को थोड़ी स्पेस दे। कुछ सुने, उसका आदर भी करे। गुरुनानक कह भी गए हैं
-जब लग रहिए दुनिया नानका, कुछ सुनिए तो कुछ कहिए।