Special
Republic Day 2008 Republic Day 2008 जयप्रकाश चौकसे.
दक्षिण अफ्रीका से महात्मा गांधी के भारत आने से कुछ माह पूर्व दादा फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ का प्रदर्शन हुआ जिसे भारतीय सिने उद्योग का प्रारंभ माना जाता है। प्रारंभिक वर्षो में सभी फिल्में परिचित धार्मिक आख्यानों पर आधारित थीं।
दर्शक इन चिरंतन कथाओं से परिचित थे, इसलिए प्रस्तुतीकरण में कमी के बावजूद उन्हें फिल्म समझ में आती थी। पहले प्रदर्शन के पांच वर्ष पश्चात अंग्रेज हाकिमों ने सेंसर लागू किया जिसका एकमात्र प्रयोजन देशभक्ति की भावना को रोकना था। उसी दौर में विदुर पर एक फिल्म बनी और नायक को गांधीजी की तरह की पोशाक दी गई और चाल-ढाल भी वैसी ही थी। यह पहली मूक फिल्म है जो प्रतिबंधित हुई।
फिल्मकारों ने छिपाकर देशभक्ति के तत्वों का समावेश किया जैसे शांताराम की ‘उदयकाल’। शशधर मुखर्जी की पहली फामरूला फिल्म ‘किस्मत’ में ‘दूर हटो ये दुनियावालों हिंदुस्तान हमारा है’ जैसा गीत सेंसर की निगाह से बच गया।
सख्त सेंसर के बावजूद गुलामी के दौर में फिल्मकारों ने देशभक्ति की अलख जगाए रखने का काम किया। आजादी के बाद देशभक्ति की फिल्में उनकी बॉक्स ऑफिस ताकत के कारण बनीं और मनोजकुमार जैसे फिल्मकारों ने देशभक्ति को नारेबाजी के साथ फॉमरूले में बदल दिया।
आजादी के अलसभोर में दिलीप कुमार अभिनीत ‘शहीद’ बहुत पसंद की गई परंतु निर्देशक रमेश सहगल की ‘26 जनवरी’ नामक फिल्म असफल हो गई। बकिंमचंद्र चटर्जी की ‘आनंदमठ’ पर फिल्म बनी जिसमें ‘वंदेमातरम’ है। उस दौर में ‘जागृति’ और ‘नास्तिक’ जैसी फिल्में बनीं जिनमें प्रेरक गीत थे ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’। क्या सत्ता उन हाथों में गई थी जो इस कश्ती को लाए थे संभालकर?
आजादी के बाद भ्रष्टाचार में वे सब लोग शामिल थे जिन्होंने इस ‘कश्ती’ को लाने का दावा किया था। गांधीजी की मृत्यु के बाद ही उनकी लहर का भी लोप कर दिया ‘कश्ती’ डुबाने वालों ने। भारत में सच्चे राष्ट्रप्रेम की लहर हमेशा सतह के नीचे समानांतर बहती है और जादुई नेतृत्व के दौर में सतह पर नजर आती है।
पंजाब से आए शिक्षक सीताराम शर्मा ने सरदार भगतसिंह पर अच्छी खासी रिसर्च करके ‘शहीद’ नामक पटकथा मनोजकुमार को सुनाई और सरदार भगतसिंह पर यह एकमात्र सशक्त और विश्वसनीय फिल्म बनी जिसमें दिलीप वाली फिल्म ‘शहीद’ की नायिका कामनी कौशल भगतसिंह की मां की भूमिका में प्रस्तुत हुईं।
चतुर व्यवसायी मनोजकुमार ने देशभक्ति को फामरूला बनाकर अनेक ‘लाउड’ फिल्में रचीं और दर्शकों की तालियां तथा बॉक्स ऑफिस पर सिक्के बटोरे। कोई 15 वर्ष बाद उनका फॉमरूला ‘संतोष’ और ‘क्लर्क’ में पिटा और अब वे अपने कैरीकेचर पर ही विरोध प्रगट करने को देशभक्ति मान रहे हैं।
आमिर खान की ‘लगान’ ने देशभक्ति को सशक्त और विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत किया और इस तरह की फिल्मों को जिन्गोइज्म से बचाकर सार्थक स्वरूप दिया। इसकी परिणति ‘रंग दे बसंती’ में हुई। आज के फिल्मकार बड़ी सार्थक देशभक्ति प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे शमित अमीन की ‘चक दे इंडिया’।
अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्रायडे’ भी राष्ट्रीय दस्तावेज की तरह है। केतन मेहता ने सरदार पटेल के जीवन पर अद्भुत फिल्म बनाई है और डॉ. जब्बार पटेल ने बाबा साहेब आंबेडकर के जीवन पर महान फिल्म बनाई है। श्याम बेनेगल ने महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षो पर ‘मेकिंग आफ महात्मा’ गढ़ी जिसे विनय पत्रिका जैसा प्रयास मानना चाहिए, क्योंकि गांधी जी पर मानस सी रचना सर रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ रही।
अनुपम खेर की फिल्म ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ कमाल की फिल्म थी परंतु फिरोज खान की ‘गांधी-माय फादर’ कमजोर फिल्म थी। राजकुमार हीरानी ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ द्वारा युवा वर्ग में गांधी के प्रति चेतना जगाई। जैसे देश में राष्ट्रप्रेम की लहर हमेशा सतह के नीचे प्रवाहित होती है और कभी-कभी सतह पर दिखाई देती है वैसे ही फिल्म उद्योग में भी होता रहा है।