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Republic Day 2008 Republic Day 2008
क्या आपने टीवी पर आ रहे चाय के एक विज्ञापन पर ध्यान दिया है। इस विज्ञापन में एक शिक्षित, जागरूक, शहरी नौजवान चाय की चुस्की लेते हुए एक राजनीतिज्ञ से बात कर रहा है, जो उसके पास आगामी चुनाव के लिए वोट मांगने आया है। वह उस नेता से देश पर शासन करने की उसकी योग्यता जानना चाहता है। इस घटना से नेता के साथ आए गुंडे हक्के-बक्के रह जाते हैं और खुद उम्मीदवार अचंभित।
नए जागरूक भारत की एक दूसरी तस्वीर देखें। अमिताभ बच्चन प्रत्येक घंटे टीवी स्क्रीन पर जोरदार ढंग से यह कहते हुए दिख जाते हैं कि पूरे भारत को एक सक्षम नेतृत्व की आवश्यकता है। नए, सुखद और समृद्घ भविष्य के लिए जिसका पूरा देश अनुगमन करेगा।
तीसरा उदाहरण देखें-‘रंग दे बसंती’, ‘चक दे इंडिया’ और ‘हल्ला बोल’ जैसी फिल्में जागरूक भारत की झलक से अधिक इस देश के नौजवानों को इस विस्तृत उपमहाद्वीप के नागरिक होने के कत्र्तव्यबोध को जोरदार ढंग से उठाती हैं। इन फिल्मों के जरिये देश के नौजवानों के भविष्य को नए नजरिये से देखने की कोशिश की गई है।
गणतंत्र दिवस पर इस जागरूक भारत की तस्वीर हर जगह दिखाई दे जाती है। एक वर्ग मानता है कि सूचना के अधिकार का कानून अपनी तमाम कमियों के बावजूद देश के नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण हथियार साबित हो रहा है। भारत युवाओं का देश है।
यहां दो-तिहाई से अधिक लोग 35 से कम उम्र के हैं। ये युवा चाहते हैं कि देश समानता और लोकतंत्र के अपने वादे को सभी नागरिकों तक पहुंचाए। यहां दिन में भी आपराधिक घटनाएं हो जाती हैं। दंगों के ऐसे बहुत से उदाहरण हैं चाहे वह 1993 के बम विस्फोट के बाद भड़के दंगे हों या 2002 के गुजरात के दंगे हों। इन दंगों की जांच के लिए विभिन्न सरकारों द्वारा कई जांच समितियां गठित की गईं पर आज तक इन समितियों की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन इस दिशा में अब आवाजें सुनाई दे रही हैं।
पिछले साल ‘रंग दे बसंती’ फिल्म के हिट होने के बाद जेसिका लाल मर्डर केस पुन: सुर्खियों में आ गया। इस केस के दोषियों को सजा दिलाने के लिए लोगों ने शांतिमार्च निकाला, जिससे न्यायालय पर इस केस की री-ट्रायल के लिए दबाव बना और दोषियों को सजा मिली।
हाल के दिनों में देश में कुछ लोगों द्वारा विदेशी सैलानियों को अपमानित करने की घटनाएं सुनने में आई हैं। हालांकि मौके पर उपस्थित फोटोग्राफरों के कारण इन घटनाओं में लिप्त लोगों की पहचान संभव हो सकी है। यह देश के मीडिया और लोगों के साथ आने का ही नतीजा है कि इस घटना से सरकारी मशीनरी और सुरक्षा नेटवर्क की पोल खुल गई।
हाल ही में एक लेख में प्रसिद्ध कानूनविद् महेश जेठमलानी ने गुजरात चुनावों में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद शासन करने वाली पार्टी की परिभाषा को सेक्युलरवाद के संदर्भ में उठाया है। वह मानते हैं कि अप्रिय सत्य यह है कि एक सेक्युलर संस्था एक कम्युनल मुद्दे को निष्प्रभावी ढंग से हल कर रही है जिससे गुजरात की राजनीति का गलत ढंग से ध्रुवीकरण हुआ।
इन चुनावों में इस्लामिक आतंकवाद को सेक्युलर आस्था का एक भाग बताया गया। जिससे लोग योग्य और अयोग्य के बीच के अंतर को लेकर उलझन में पड़ गए। इसने गुजरात में धार्मिक खाई को और चौड़ा किया है। इसकी प्रतिध्वनि को पूरे देश में महसूस किया जा सकता है।आज भारत की अर्थव्यवस्था सरपट दौड़ रही है। फिर भी अमीर-गरीब की खाई दिन-प्रतिदिन चौड़ी होती जा रही है। देश के किसान आत्महत्या कर हैं।
युवाओं का एक वर्ग आज मीडिया द्वारा परोसे जा रहे अमीर लोगों की लाइफ स्टाइल को अपनाना चाह रहा है। शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के भारतीय समाज में एक जिम्मेदार नागरिक बनाने की मुहिम धीमी गति से, पर लगातार आगे बढ़ रही है। सूचना का अधिकार कानून सत्य को लोगों की भलाई के लिए उजागर करने वाले कार्यकर्ताओं को काफी उत्साहित करेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि गणतंत्र दिवस के मौके पर यह नया दौर भारत के लाखों लोगों को जागरुक करेगा। जिससे कि भारत के नागरिकों के लिए एक जिम्मेदार सरकार और प्रशासनिक तंत्र को विकसित किया जा सके।