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Padma Vibhushan Padma Vibhushan मुंबई. एक बच्चा गड्ढे में गिर गया है और कैमरा, लाइट वगैरा के साथ पूरी यूनिट उस गड्ढे के इर्द-गिर्द जमा होकर लगातार एक तमाशा आपको लाइव दिखा रही है। तयशुदा पैमानों पर क्या इसे खबर कहा जाएगा? जी नहीं, एनडीटीवी से जुड़े मशहूर पत्रकार विनोद दुआ इसे खबर मानने से इंकार करते हैं। इस साल पद्मश्री से सम्मानित किए गए दुआ ने भवेश दिलशाद से खास तौर पर बातचीत की..
- सबसे पहले तो पद्मश्री के लिए बधाई स्वीकार करें, यह सम्मान कुछ खास है? क्यों?
धन्यवाद। देखिए हमारा मानना है कि सरकारें जनता के विश्वास का प्रतीक होती हैं, लोकतंत्र में सरकार हम चुनते हैं, उन्हें सत्ता हम देते हैं। तो ऐसे में सरकार के सभी फैसले जनता के भरोसे और जन-मन के ही प्रतिबिंब होते हैं।
यह हमारा अधिकार है कि हम उन फैसलों को स्वीकार करें या अस्वीकार। चूंकि यह सम्मान जनता के विश्वास का प्रतीक है इसलिए मैं इसे इस रूप में महत्वपूर्ण समझता हूं।
- इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के क्षेत्र में इस साल तीन पद्मश्री प्रदान किए गए हैं, इसका सीधा सा अर्थ क्या है?
मेरी नजर में यह वाकई टेलीविजन पत्रकारिता का सम्मान है और पहली बार टीवी पत्रकारिता के लिए पद्मश्री दिए गए हैं। इससे पहले मुख्यत: प्रिंट पत्रकारिता के लिए ही ये नागरिक सम्मान दिए जाते रहे हैं।
- तो टीवी पत्रकारिता का मुकाम क्या माना जाए?
टीवी पत्रकारिता बहुत पुरानी नहीं है, गौर से देखिए तो पिछले पांच-छह सालों में ही न्यूज चैनलों का जमाना आया है। हम तो ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के दौर से पत्रकारिता कर रहे हैं लेकिन बरखा और राजदीप इसी युग में उभरे हैं। दोनों ही काबिल पत्रकार हैं।
कुल मिलाकर टीवी पत्रकारिता अपना स्थान और प्रभाव साबित कर चुकी है और इसे पहचानने और सम्मान देने की शुरुआत हो चुकी है। अभी कई बेहतरीन पत्रकार कतार में हैं और उन्हें भी जरूर इसी तरह सम्मानित किया जाएगा।
- इतने सारे चैनलों से यह साफ है कि खबर तो बिक रही है लेकिन क्या कोई मिशन भी बाकी है खबरनवीसों के पास?
पहले तो बात करें खबर की। प्रिंस का गड्ढे में गिरना खबर है कि लेकिन उसके बाद पूरा तमाशा खबर नहीं है, इसे लो कॉस्ट रिएलिटी टेलीविजन कहना चाहिए। सस्ते में उपलब्ध तमाशे से दर्शकों के साथ बेईमानी है यह। तो इस तरह का मसाला या चुटकुलेबाजी दिखाना तो खबर के नाम पर छल करना है।
रही बात मिशन की तो, किसी मिशन को लेकर चलना पत्रकार का काम नहीं है। आप एक कार्यकर्ता के तौर पर पत्रकारिता करते हैं तो उससे पत्रकारिता का नुकसान होता है। अरुण शौरी साहब ने भी पत्रकारिता के नाम पर एक पार्टी को ही आगे बढ़ाने का काम किया। क्या इसे पत्रकारिता कहना चाहिए? मिशन के लिए एनजीओ बेहतर विकल्प हैं या फिर राजनीति।
- भारतीय राजनीति को दिशा देने में मीडिया क्या और कितना रोल अदा करता है?
ऐसे तो टीवी न्यूज एक उत्पाद है लेकिन अगर संपादकीय या लेखन की दृष्टि से यह विचार है। जो घट रहा है, वह क्यों और कैसे घट रहा है, उसका परिणाम क्या हो सकता है, इन पहलुओं पर जानकारी देने का पर्याय है समाचार। जानकारी ही ताकत है तो लोगों को जागरूक और सशक्त करना ही मीडिया का राजनीति में रोल कहा जा सकता है।
- गणतंत्र के 58 साल हो गए हैं, इस पूरे समय में पत्रकारिता का क्या रोल रहा है?
मेरा मानना है कि लोकतंत्र एक अपूर्ण प्रक्रिया है लेकिन मैं इस अपूर्ण लोकतंत्र को चुनूंगा अगर दूसरा विकल्प संपूर्ण तानाशाही हो तो।
इसी तरह एक कुचले हुए अधिकारहीन मीडिया के मुकाबले मेरी पसंद है अपूर्ण (इमपरफैक्ट) मीडिया। किसी देश के लिए 58 साल बहुत नहीं होते हैं। हमारा गणतंत्र जीवंत है और मीडिया भी। पाकिस्तान की तरह नहीं जहां मीडिया के हाथ कटे हुए हैं।
- मीडिया में कैरियर बनाने के महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए दो शब्द..
बस इतना समझ लीजिए मेहनत बहुत है। नकली सत्ता बोध से बचना जरूरी है और यह भी ध्यान रखें यहां चोर दरवाजे नहीं होते। फिर यह पत्रकारिता का उदयकाल है, बहुत अवसर हैं ईमानदारी से काम करें।