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नए समाज की संरचना का संकल्प

संपादकीय. भारतवर्ष को गणतंत्र बनाने वाला संविधान आजाद भारत में एक नए समाज की संरचना का संकल्प है। समाज के पिछड़े, शोषित, उपेक्षित, गरीबी और उत्पीड़न के शिकार लोगों की आर्थिक, सामाजिक उन्नति के साथ उनके हितों व अधिकारों की रक्षा के अनेक प्रावधान संविधान में किए गए हैं, जिससे वे सभी समाज और देश की मुख्यधारा में शामिल हो सकें तथा देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

इन प्रावधानों को अमल में लाने के लिए अनेक संवैधानिक संस्थाओं का गठन किया गया है, लेकिन आधी सदी से अधिक का अनुभव यही बताता है कि ये संवैधानिक संस्थाएं अपनी सार्थक भूमिका निभाने में लगभग असफल रही हैं। जिन वर्गो के हितों और अधिकारों की रक्षा तथा उनके विकास के लिए ये संस्थाएं गठित की गई हैं, उन वर्गो के हालात में कोई खास बदलाव नहीं आने के कारण इन संस्थाओं की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

यह बात भी उठती रही है कि ये तमाम संस्थाएं राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों की पनाह स्थली बन गई हैं और उन्हीं की सुख-सुविधाओं तक सीमित हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन संस्थाओं में अपने उद्देश्यों के प्रति अनुत्तरदायित्व का भाव हो। संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत इन संस्थाओं की रपटों और सिफारिशों पर सदन में बहस होनी चाहिए तथा सरकार पर उनके निर्णय बंधनकारी भी होते हैं।

अनुभव यह बताता है कि इन संस्थाओं का गठन कर संविधान की अवहेलना करने के लांछन से सरकार बचने का प्रयास तो करती है, लेकिन इनकी सिफारिशों को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता। इन संस्थाओं की रपटें सालों फाइलों में धूल खाती रहती हैं और पीड़ित, शोषित वर्ग आजादी के 6 दशक बाद भी अपनी पीड़ा और वेदना से मुक्त होने की लालसा पाले हुए है।

गणतंत्र केवल संविधान को अंगीकार करने भर से मूर्तरूप नहीं ले सकता। इसके लिए जरूरी है कि संवैधानिक प्रावधानों पर पूरी गंभीरता से अमल किया जाए। इसी में संवैधानिक संस्थाओं की सार्थकता निहित है। गर्व और खुशहाली के साथ गणतंत्र दिवस मना लेने के बाद अगला गणतंत्र दिवस नए समाज की संरचना की ओर कदम बढ़ाता दिखे, इसके प्रति संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों के साथ ही जनप्रतिनिधियों और सरकारों को भी अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी।





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