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खुशी के आंसू, सवालों का दरिया

इंदौर.in 18 जनवरी को ग्वालियर से लापता निकोलस पिरामल कंपनी के पीथमपुर यूनिट के प्रेसीडेंट अश्विन भट्ट और ड्राइवर बाबूसिंह पटेल 26 जनवरी की सुबह अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त हो गए। पुलिस के मुताबिक वे एसटीएफ को ग्वालियर के पास जंगल में एक झोपड़ी के पास खड़े मिले। तब उनकी आंखों पर पट्टी और हाथ बंधे थे।

वहां से उन्हें ग्वालियर ले जाया गया। रविवार सुबह करीब 6 बजे उन्हें इंदौर लाया गया। श्री भट्ट के मुताबिक एक गिरोह ने उनका अपहरण कर दूसरे को सौंप दिया था। नाटकीय अंदाज में हुई रिहाई के बाद फिरौती दिए जाने की भी चर्चा है। हालांकि पुलिस और कंपनी ने इसका खंडन किया है।

श्री भट्ट राज्य सरकार द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय मीट एक्पोर्टेक-2008 में भाग लेकर 18 जनवरी की सुबह 11.30 बजे कार से इंदौर के लिए निकले थे जिसे ड्राइवर बाबूसिंह पटेल चला रहा था। उसके बाद से दोनों नहीं मिले। उनकी कार धौलपुर में लावारिस मिली थी। इंदौर-ग्वालियर पुलिस ने पहले दोनों की गुमशुदगी कायम की। 24 जनवरी को इंदौर में अपहरण का प्रकरण दर्ज किया गया।

आईजी, एसटीएफ संजीव कुमार सिंह के मुताबिक अपहरण घाटीगांव और मोहना के बीच हाईवे से किया गया था। पुलिस और एसटीएफ ने अपहरणकर्ताओं पर दबाव बना रखा था। उनके ठिकाने का पता भी लग गया था और इसकी जानकारी भी उन्हें थी इसलिए वे मुरैना जिले के सरायछौला थाना क्षेत्र में दोनों को छोड़ भागे। पुलिस का उनसे सामना नहीं हो पाया।

यूं अगवा किए गए

श्री भट्ट ने 'भास्कर' को बताया उस दिन वे ग्वालियर से इंदौर के लिए निकले ही थे कि एक सूमो ने कार को ओवरटेक कर रास्ता रोक दिया। चार बदमाशों ने कार के आगे-पीछे के गेट खोले और जबर्दस्ती घुस आए। एक बदमाश ने ड्राइवर को थप्पड़ मारकर फायर कर दिया। गोली लेफ्ट साइड का कांच फोड़ते हुए निकल गई।

फिर दूसरी तरफ से घुसे बदमाशों ने दोनों को काबू कर हमारी कार से ही अगुवा कर लिया। करीब 4 किलोमीटर चलने के बाद कार रोकी और मुझे सूमो के बीच की सीट पर व ड्राइवर को पीछे पटक दिया। वहां दोनों की आंखों पर पट्टी बांधकर कान में रूई ठूंस दी। करीब चार घंटे तक सूमो उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलती रही। फिर एक जगह चार-पांच घंटे खड़ी रही। उसके बाद जंगल तथा बीहड़ों के रास्ते घंटों पैदल चलकर एक कच्चे कमर में पहुंचे।

श्री भट्ट बताते हैं तब हमें अहसास हुआ कि अपहरण करने वाले कोई और थे और बाद में बंधक रखने वाले कोई और। पहले गिरोह के सदस्य गाली-गलौज ज्यादा करते थे, जबकि दूसरे गिरोह के लोग गुपचुप बातें करते थे। जिस कमर में रखा था उसकी दीवार, छत और जमीन कच्ची थी। कमर में ले जाकर आंख की पट्टियां तो खोल दीं लेकिन कान से रूई नहीं निकालने दी। वहां आठ-दस बदमाश थे।





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