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मान्यता: संजय की शक्ति का रहस्य

परदे के पीछे.manyata संजय दत्त के जीवन में पहले आईं तमाम लड़कियां मान्यता से ज्यादा सुंदर और बेहतर पृष्ठभूमि से आई थीं। अगर वह अत्यंत साधारण है, तो क्या यही संजय के लिए अजूबा है? बाला साहेब ठाकरे के जन्मदिन पर संजय दत्त और मान्यता दत्त ने बतौर पति-पत्नी ‘सामना’ नामक अखबार में आधे पृष्ठ का विज्ञापन दिया। कुछ दिन पूर्व संजय दत्त की बहन प्रिया के पति रोनकॅान ने इस रिश्ते को परिभाषित करने से इंकार किया था। उन्हें नहीं मालूम था कि वे विवाहित हैं।

विगत कुछ माह से मान्यता के बारे में अटकलें लगाई जा रही थीं कि संजय दत्त के जीवन, व्यवसाय और निवास पर मान्यता का संपूर्ण नियंत्रण है और उसने संजय दत्त की पुरानी कैबिनेट के कई मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया था। दत्त घराने में उसने आपातकाल सा लगा दिया था। सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण वहां पहले कभी नहीं देखा गया।

ज्ञातव्य है कि मान्यता का असली नाम शहनाज खान है और उसने कुछ फिल्मों में आइटम नंबर किए हैं, परंतु वह मलाइका या ईशा कोप्पीकर की श्रेणी में कभी नहीं थी। प्रकाश झा की फिल्म में भी एक आइटम किया था। दरअसल मान्यता उर्फ शहनाज की जो छवि रही है उस पर संजय दत्त अभिनीत पात्र टपोरी मुन्नाभाई तो आशिक हो सकता था, बल्कि वह शायद सर्किट जैसे पात्र के लिए ‘मेड फॉर ईच अदर’ होती। सांसद प्रिया दत्त की भाभी वे नहीं लगतीं।

लंबी पदयात्रा करने वाले सांसद सुनील दत्त की बहू की छवि कुछ और ही उभरती है। पद्मश्री श्रीमती नरगिस दत्त द्वारा कमर में बांधा गया चाबियों का गुच्छा मान्यता की कमर के लिए भारी है।

बहरहाल यह बताना कठिन है कि इन दोनों की मुलाकात कैसे हुई और प्रेम का संबंध कब बना? विशेषज्ञों का कहना है कि लैला कतई सुंदर नहीं थी, परंतु उसे मजनू की आंखों से देखिए। प्यार नजरिया भी है और नजर भी। कभी-कभी यहां मोतियाबिंद भी हो जाता हैं। प्राय: मोतियाबिंद का रोग सठियाने के बाद ही होता है, परंतु प्रेम का मोतियाबिंद किसी भी उम्र में हो सकता है। संजय दत्त शायद पचास के आसपास हैं।

संजय के आसपास के लोगों ने अफवाह उड़ाई है कि पाली हिल (निवास स्थान) में ननदों की हुकूमत समाप्त हो गई और भाभी मान्यता का एकछत्र राज चल रहा है। भारतीय समाज में ननदों और भाभियों के रिश्ते प्राय: आक्रमक होते हैं, क्योंकि साथ पलकर जवान होने पर बहनों के मन में अधिकार का भाव आ जाता है और ‘बाहर से आई लड़की’ उन्हें आक्रमणकर्ता लगती है।

इस छाया युद्ध में माताएं प्राय: अपनी बेटियों का साथ देती हैं। बहरहाल संजय दत्त के मुकदमें में उनकी सांसद बहन प्रिया की अहम भूमिका रही है और उन्हें उसकी आवश्यकता भविष्य में भी रहेगी, अत: इस तथाकथित गृहयुद्ध के घातक परिणाम हो सकते हैं।

बहरहाल मान्यता में ऐसा क्या है कि वह संजय दत्त की दुनिया की धुरी बन गई है? वह धनवान नहीं है और करीना कपूर की तरह रूपवान भी नहीं है कि सैफ अपना प्रेम सिद्ध करने के लिए चाकू से हथेली काट लें जैसी ग्रीस से कुछ खबर आई है। वह किसी राजघराने से भी नहीं आई है। उसके पास कौन सा रहस्यमय जादू है? उसके पहले संजय दत्त के जीवन में आईं तमाम लड़कियां मान्यता से ज्यादा सुंदर और बेहतर पृष्ठभूमि से आई थीं।

अगर वह अत्यंत साधारण है, तो क्या यही संजय के लिए अजूबा है? इसका दूसरा पक्ष यह हो सकता है कि संजय दत्त का भीतरी स्वरूप ही घाटीपन की ओर आकर्षित होने के लिए बना था और श्रेष्ठि वर्ग की लड़कियों का उसके जीवन में आना उनकी नादानी थी या सितारा करिश्मा।

अभिनेता संजय के कैरियर से मुन्नाभाई को निकाल दें तो वह अत्यंत साधारण रहा है और डाकू पात्रों या ‘खलनायक’ के रूप में महारत हासिल की है। उस पर हथियार, शिकार और ड्रग्स के आरोप लगते रहे हैं और शक्तिशाली घराने में पैदा होने के कारण वह बचता रहा है। वह अपने पिता द्वारा अभिनीत ‘मदर इंडिया’ के बिरजू की तरह उद्दंड, उद्देश्यहीन और हिंसक रहा है।

बिरजू की तरह वह अपनी मां से बेइंतहा प्यार करता रहा, परंतु उसकी हरकतों से कभी यह प्यार अभिव्यक्त नहीं हुआ। प्राय: देखा गया है कि सुंदर स्त्री से विवाहित व्यक्ति की रखैल असुंदर और बेढंगी होती है। कई स्त्रियां पुरुष को राजा की तरह आदर देकर उस पर शासन करती हैं। हर व्यक्ति के भीतर यह चाह दबी रहती है कि, किसी छोटे से कोने में ही सही, कोई तो उसे चक्रवर्ती राजा समझे। शायद संजय की इस दबी हुई चाह को मान्यता मिली।





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