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सवाल सरकारी सुरक्षा या निजी प्रतिष्ठा का

उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती काफी गुस्से में हैं। केंद्र ने विशेष सुरक्षा ग्रुप (एसपीजी) की सुरक्षा मुहैया कराने के उनके अनुरोध को नहीं माना है। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह सुरक्षा एसपीजी अधिनियम के तहत केवल राष्ट्रपति, वर्तमान एवं पूर्व प्रधानमंत्रियों तथा उनके पारिवारिक सदस्यों को ही दी जा सकती है। साथ ही केंद्र का यह भी कहना है कि यदि उन्हें एसपीजी सुरक्षा दी गई तो अन्य राज्यों से भी ऐसी मांग आएगी।

मायावती चाहती हैं कि यदि उन्हें एसपीजी सुरक्षा देने में कानूनी अड़चन है तो कानून में संशोधन किया जाए। चूंकि ऐसा नहीं किया गया इसलिए इसमें उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार द्वारा अपनी हत्या की साजिश रचे जाने की बू तक आई। जो भी हो, फिलहाल उनकी सुरक्षा में लगे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड एसपीजी के 36 कमांडो की संख्या बढ़ाकर 100 कर दी गई है।

यहां सवाल सुरक्षा का है या प्रतिष्ठा का? मायावती के साथ एनएसजी का लंबा-चौड़ा काफिला चलता ही है। अपने राज्य में अपनी सुरक्षा उनकी ही जिम्मेदारी है किंतु जहां तक राज्य के बाहर की बात है तो केंद्र या अन्य राज्यों की जिम्मेदारी वहां होती है। परंतु राज्य के बाहर भी एनएसजी की सुरक्षा पर्याप्त है। दूसरी बात यह है कि एक मुख्यमंत्री को कितनी बार दूसरे प्रदेशों का दौरा करने की जरूरत होती है।

रामपुर में सीआरपीएफ कैंप पर हुए आतंकवादी हमले के बाद कांग्रेस ने उन पर यही आरोप लगाया है कि मायावती को पूरे देश में अपने दल का जनाधार बढ़ाने की चिंता ज्यादा है और प्रदेश की सुरक्षा की चिंता कम। यह आरोप बेबुनियाद नहीं है। यह भी सही है कि हर राजनीतिक नेता को अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए प्रयास करने का अधिकार है। परंतु यह शासन की कीमत पर नहीं होना चाहिए। बहुजन समाज पार्टी की परेशानी यह है कि कुछ अन्य दलों की तरह यह एक व्यक्ति केंद्रित पार्टी है जिसे सरकार भी चलाना है और पूरे देश में घूमना भी है।

जो भी हो, यहां मुद्दा सुरक्षा का है। यदि मायावती को एसपीजी सुरक्षा चाहिए तो अन्य मुख्यमंत्रियों या बड़े नेताओं को क्यों नहीं? आजकल तो ऐसे ही नेताओं की सुरक्षा से परेशान है। यदि एसपीजी सुरक्षा इस तरह से बढ़ाई गई तो आम आदमी का जीना मुहाल हो जाएगा, क्योंकि एसपीजी वाले जहां भी जाते हैं, पहले वे उस क्षेत्र को अपने अधीन कर लेते हैं। जहां किसी का आना-जाना संभव नहीं है, परंतु मायावती को लगता है कि यदि राबर्ट वाडरा को यह सुरक्षा मिल सकती है तो उन्हें क्यों नहीं।

अभी हाल ही में हवाई अड्डों पर सुरक्षा के जांच दायरे से राबर्ट वाडरा को बाहर रखने और तीनों सेनाओं के प्रमुखों को न रखने की खबर पर काफी हाय-तौबा मची और अंत में नागरिक विमानन मंत्रालय ने जांच के दायरे से बाहर रहने वालों की सूची को संशोधित कर उन्हें भी उसमें शामिल कर लिया। सचाई यह है कि ये तीनों सेना प्रमुख अंतर्देशीय यात्रा तो विशेष विमान से करते हैं, इसलिए सुरक्षा जांच का सवाल ही पैदा नहीं होता। विदेश यात्राओं पर जाते वक्त जो एक साल में बमुश्किल दो-तीन बार होती है, जांच की बात होती है, परंतु उनकी जांच कभी की नहीं जाती क्योंकि वे खुद ही सुरक्षा कर्मियों की लंबी फौज से घिरे होते हैं।

कई सेना प्रमुखों ने टीवी चैनलों को दिए गए साक्षात्कारों में स्वीकार किया कि उनकी सुरक्षा जांच कभी नहीं की गई। परंतु सवाल इज्जत का था इसलिए इस पर हंगामा हुआ। 1980 तक इस सूची में मात्र राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा अध्यक्ष और राज्यों के राज्यपालों को शामिल किया गया था लेकिन प्रतिष्ठा के प्रश्न पर सूची को लगातार लंबा किया जाता रहा।

अमेरिका की व्यवस्था से यहां पर सीख ली जा सकती है। वहां सुरक्षा जांच का काम एक निजी एजेंसी को सौंप दिया गया है। उसके साथ हुए सरकारी करार में यह लिखा हुआ है कि हर व्यक्ति की जांच होगी और यदि वह एजेंसी किसी को भी छोड़ देती है, तो यह करार का उल्लंघन माना जाएगा। कोई जांच का बुरा नहीं मानता है और सभी सहयोग करते हैं, यहां तक कि अमेरिका कांग्रेस के सदस्य जॉन डिंगले को एक बार सुरक्षा जांच के दरम्यान अंडरवियर को छोड़कर बाकी कपड़े भी उतारने पड़े थे, क्योंकि मेटल डिटेक्टर ने धातु होने का संदेह पैदा कर दिया।

दुर्भाग्य से अपने देश में वीआईपी संस्कृति इस तरह हावी होती जा रही है कि कोई व्यक्ति आम रहना ही नहीं चाहता है। जो भी व्यक्ति कुछ है या कुछ रह चुका होता है, वह अपने को कानून से ऊपर समझता है और सुरक्षा जांच करने पर उन्हें धमकी देता है। ये वीआईपी सुरक्षा जांच से खुद को बाहर रखना चाहते हैं क्योंकि इससे उन्हें परेशानी होती है। परंतु अपनी सुरक्षा के लिए लंबा-चौड़ा काफिला लेकर चलते हैं चाहे जनता को कितनी भी परेशानी क्यों न हो। एसपीजी सुरक्षा मिलने से मायावती का कद प्रधानमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री के बराबर हो जाएगा। वह स्वयं को भावी प्रधानमंत्री मान रही हैं और अपने लक्ष्य का खुले शब्दों में इजहार भी उन्होंने किया है। इसलिए वैसी सुरक्षा की तो वह पहले से हकदार हैं।

-लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।





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